Aniruddhacharya Karnal: घर में बंद रही, फोन छीना… फिर प्रेम विवाह की जिद्द, कथा में युवती की व्यथा पर बोले अनिरुद्धाचार्य

घर में बंद रही, फोन छीना... फिर प्रेम विवाह की जिद्द, कथा में युवती की व्यथा पर बोले अनिरुद्धाचार्य
Aniruddhacharya Karnal: हरियाणा के करनाल जिले स्थित तरावड़ी में चल रही अनिरुद्धाचार्य की कथा के दौरान आयोजित प्रश्नोत्तरी सत्र में एक बार फिर धार्मिक मान्यताओं और आधुनिक अधिकारों के बीच का टकराव देखने को मिला।
कथा में पहुंची एक शिक्षित युवती ने जब अंतरजातीय प्रेम विवाह और उसके कारण परिवार द्वारा झेली गई प्रताड़ना का मुद्दा उठाया, तो कथावाचक अनिरुद्धाचार्य ने धार्मिक ग्रंथों का हवाला देकर इस विवाह को सिरे से खारिज कर दिया। कथावाचक ने युवती के कदम को धर्म के विपरीत बताते हुए यहां तक कह दिया कि यह प्यार नहीं बल्कि वासना है।
‘मां ने कमरे में बंद किया, फोन छीना फिर भी किया विवाह’
कथा मंडप में प्रश्नोत्तरी के दौरान युवती ने अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया कि वह ब्राह्मण समाज से ताल्लुक रखती है और उसने एक अनुसूचित जाति (SC) के युवक से प्रेम किया था। जब उसने अपनी मां को इस रिश्ते के बारे में बताया और शादी की इच्छा जताई, तो जातिगत कारणों से परिवार ने साफ इनकार कर दिया।
युवती का आरोप है कि उसकी मां उसे दफ्तर से जबरन घर ले आई और करीब एक महीने तक कमरे में बंद रखा। उसका मोबाइल भी छीन लिया गया और नौकरी पर जाने से रोक दिया गया। इस मानसिक तनाव के बाद उसने घर छोड़कर प्रेमी से शादी कर ली।
शास्त्रों का हवाला देकर बोले आचार्य- ‘संतान होगी वर्ण संकर’
युवती की बात सुनने के बाद कथावाचक अनिरुद्धाचार्य ने उसकी मां के कदम को धार्मिक दृष्टि से सही ठहराया। उन्होंने कहा कि शास्त्रों के अनुसार ब्राह्मण का विवाह ब्राह्मण में ही होना चाहिए।
आचार्य ने दावा किया कि अलग जाति में विवाह करने से उत्पन्न होने वाली संतान भगवद्गीता के अनुसार ‘वर्ण संकर’ कहलाती है और ऐसी संतानों द्वारा दिए गए जल को पितर ग्रहण नहीं करते। उन्होंने कहा कि देश का संविधान भले ही अपनी मर्जी से शादी की इजाजत देता हो, लेकिन सनातन धर्म के नियमों के हिसाब से यह पूरी तरह अनुचित है।
‘यह प्रेम नहीं वासना है’- कथावाचक की तीखी टिप्पणी
संवाद के दौरान जब युवती ने तर्क दिया कि किसी से निस्वार्थ प्रेम करना कोई गुनाह नहीं है, तो अनिरुद्धाचार्य भड़क गए। उन्होंने युवती से पूछा कि जिस मां ने जन्म दिया और पढ़ाया-लिखाया, उसके निस्वार्थ प्रेम को क्यों नकार दिया? कथावाचक ने तीखे लहजे में कहा कि जिसे युवती प्रेम समझ रही है, वह वास्तव में केवल शारीरिक आकर्षण और वासना है। उन्होंने कहा कि प्रेम तो कुत्ते और गधे से भी किया जा सकता है, लेकिन विवाह संस्कारों और धर्म के दायरे में ही होना चाहिए।
संविधान और धर्म का फर्क, पति के साथ रहने की सलाह
युवती ने कथावाचक से गुहार लगाई कि वह अपने परिवार से रिश्ता खत्म नहीं करना चाहती और चाहती है कि घरवाले उसके और उसके पति को स्वीकार कर लें। इस पर आचार्य ने कहा कि अब जब शादी हो चुकी है, तो युवती को अपने पति के साथ रहकर ही सास-ससुर की सेवा करनी चाहिए और परिवार को मनाने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि संविधान और धर्म दो अलग रास्ते हैं, और बिना सोचे-समझे उठाए गए कदमों का परिणाम बाद में भुगतना पड़ता है।
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