Thought of the day: परसाई जी का वो सुविचार जो आज के सोशल मीडिया दौर का असली आईना है

परसाई जी का वो सुविचार जो आज के सोशल मीडिया दौर का असली आईना है
Thought of the day: हिंदी साहित्य के बेबाक लेखक और महान व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की आज पुण्यतिथि है। परसाई जी ने अपनी तीखी कलम से समाज में फैली विसंगतियों, पाखंडों और मानवीय कमजोरियों पर जो प्रहार किए, वे आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने दशकों पहले थे। उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर उनका एक ऐसा ही कटाक्ष याद आता है, जो इंसान को अपनी अज्ञानता का ढोल पीटने से रोकता है और उसे अपनी सीमाओं का बोध कराता है।
परसाई जी ने एक जगह लिखा था— “आत्मविश्वास धन का होता है, विद्या का भी और बल का भी, पर सबसे बड़ा आत्मविश्वास नासमझी का होता है।” यह पंक्तियां देखने में जितनी सीधी और सरल लगती हैं, इनका मर्म उतना ही गहरा है। इसमें उन्होंने उस सामाजिक और मानसिक व्यवस्था पर सीधा प्रहार किया है, जहां व्यक्ति अपने ज्ञान की कमी को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत समझ बैठता है।
विवेकहीन आत्मविश्वास की कोई सीमा नहीं होती
जीवन में आगे बढ़ने के लिए आत्मविश्वास जरूरी है, इसमें कोई दो राय नहीं। अगर किसी के पास धन है, तो उसके सही इस्तेमाल का आत्मविश्वास होना चाहिए। विद्या है, तो अपनी समझ पर भरोसा होना स्वाभाविक है। शरीर में बल है, तो उसका सही दिशा में इस्तेमाल करने का साहस भी चाहिए। लेकिन इन सभी तरह के आत्मविश्वास का एक ठोस आधार होता है और उनकी एक निश्चित सीमा होती है। व्यक्ति जानता है कि उसकी क्षमताएं कहां तक हैं और उसकी कमियां क्या हैं।
इसके विपरीत, नासमझी से उपजा आत्मविश्वास बिल्कुल अलग और खतरनाक होता है। नासमझ इंसान को अक्सर यह अहसास ही नहीं होता कि वह नासमझ है। उसे अपनी जानकारी का अभाव दिखता ही नहीं, इसलिए वह हर विषय पर अंतिम राय देने में सबसे आगे रहता है। उसे किसी से सवाल पूछने या सीखने में कोई झिझक नहीं होती, क्योंकि वह मान चुका होता है कि जो वह जानता है, वही परम सत्य है।
डिजिटल दौर में और भी प्रासंगिक हुआ परसाई का यह आईना
परसाई के व्यंग्य की सबसे बड़ी खासियत यही रही कि वे पढ़ते वक्त चेहरे पर मुस्कान तो लाते ही हैं, साथ ही इंसान को अंदर तक झकझोर कर आईना भी दिखा देते हैं। आज के इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में उनका यह कटाक्ष और भी सटीक बैठता है। आज हर हाथ में मंच है और हर कोई अपनी बात रखने को स्वतंत्र है। यह बदलाव भले ही सकारात्मक हो, लेकिन इसने ज्ञान और विशेषज्ञता के बीच की रेखा को बहुत धुंधला कर दिया है।
आज किसी विषय पर दो पंक्तियां पढ़ते ही खुद को विशेषज्ञ मान लेने की प्रवृत्ति बढ़ गई है। असल आत्मविश्वास शायद इस बात को स्वीकार करने में है कि ‘मुझे यह नहीं पता’। ज्ञान की पहली सीढ़ी यही स्वीकारोक्ति है। परसाई हमें यही याद दिलाते हैं कि जैसे-जैसे ज्ञान बढ़ता है, व्यक्ति में उतनी ही विनम्रता आनी चाहिए। इसलिए आत्मविश्वास जरूर रखिए, लेकिन उसके पीछे विवेक का होना बेहद जरूरी है—वरना वही आत्मविश्वास नासमझी का सबसे घातक हथियार बन जाता है।
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