Bahadur Shah Zafar Wives: रंगून गए थे जफर, दिल्ली में तड़प कर रह गईं बेगमें; निजामुद्दीन में दफन है मुगलों का ये बड़ा राज
Feb 26, 2026 1:07 PM
Bahadur Shah Zafar Wives: दिल्ली-एनसीआर की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग अक्सर इतिहास के पन्नों पर ही चलते हैं। मध्य दिल्ली की हजरत निजामुद्दीन बस्ती में 'चौसठ खंभा' और मशहूर शायर मिर्जा गालिब की संगमरमर की मजार के बीच एक छोटा सा रास्ता है। इस रास्ते पर मौजूद कुछ गुमनाम और बिना नाम वाली कब्रों के पास से लोग रोज गुजरते हैं। हेरिटेज वॉक पर निकलने वाले लोग भी इन्हें आम पत्थर समझकर आगे बढ़ जाते हैं। सच्चाई यह है कि ये साधारण सी दिखने वाली कब्रें भारत के अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर की बेगमों (पत्नियों) की हैं।
अंग्रेजों की कैद और दिल्ली में छूटी बेगमें
साल 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने मुगलों की सत्ता पूरी तरह खत्म कर दी थी। सम्राट बहादुर शाह जफर को बंदी बनाकर दूर रंगून (म्यांमार) निर्वासित कर दिया गया। उनके साथ सिर्फ एक पत्नी, बेगम जीनत महल को जाने की इजाजत मिली थी। रंगून में ही जफर और जीनत महल ने अपनी आखिरी सांस ली। जफर की बाकी बेगमें उस उथल-पुथल वाले दौर में दिल्ली में ही रह गईं। मौत के बाद उन्हें इसी निजामुद्दीन बस्ती के एक गुमनाम कोने में दफना दिया गया।
एएसआई के दस्तावेजों से खुला ऐतिहासिक राज
आज इन कब्रों पर कोई शिलालेख या नाम मौजूद नहीं है। इनका इतिहास मौलवी जफर हसन की किताब 'मेमॉयर्स ऑफ द आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया' में दर्ज एक छोटे से हिस्से से सामने आता है। एक एएसआई अधिकारी के तौर पर उन्होंने यह कीमती जानकारी स्टीफन कैर की किताब 'आर्कियोलॉजी एंड मॉन्यूमेंटल रिमेंस ऑफ दिल्ली' से जुटाई थी। इन लेखकों के अनुसार, ये गुमनाम कब्रें जफर की पत्नियों- बेगम अशरफ महल, बेगम अख्तर महल और बेगम ताज महल की हैं।
निजामुद्दीन दरगाह से मुगलों का गहरा नाता
मुगल राजघराने की महिलाओं को इसी जगह क्यों दफनाया गया, इसका भी एक पुख्ता ऐतिहासिक कारण है। दिल्ली के एक हजार से ज्यादा स्मारकों पर दो खंडों की सूची तैयार करने वाले 'आगा खान ट्रस्ट फॉर कल्चर' के रतीश नंदा बताते हैं कि 'चौसठ खंभा' सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह के बेहद करीब है। अपने पूरे शासनकाल में मुगल शासकों ने इस दरगाह के प्रति गहरी आस्था रखी। सभी 18 मुगल शासकों का इस सूफी जमीन से सीधा जुड़ाव रहा, चाहे वह तीर्थयात्रा हो, वास्तुकला हो या फिर इसे अपनी आखिरी आरामगाह बनाना हो। अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार होने से ठीक पहले जफर ने मुगल खजाने के पवित्र अवशेष भी इसी दरगाह को सौंप दिए थे।
इतिहास को जानने के बाद लोगों ने दी श्रद्धांजलि
जफर की बेगमों के साथ-साथ उनकी कुछ बेटियों को भी इसी पवित्र जमीन पर दफनाया गया था। हालांकि, जफर के छोटे भाई मिर्जा जहांगीर कुछ भाग्यशाली रहे, जिन्हें मुख्य दरगाह परिसर के अंदर दफनाया गया। दिल्ली एक ऐसा महानगर है जहां पॉश होटलों और आम कॉलोनियों के नीचे पुरानी कब्रें मौजूद हैं। आज भी जब स्थानीय लोगों और युवाओं को 'चौसठ खंभा' के बाहर पड़े इन पत्थरों की असल अहमियत पता चलती है, तो वे यहां रुककर मुगल रॉयल्टी की इन भूली-बिसरी महिलाओं को पूरे सम्मान के साथ श्रद्धांजलि जरूर देते हैं।