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खाद संकट पर सरकार का बड़ा कदम: 25 लाख टन यूरिया के लिए ग्लोबल टेंडर जारी

Apr 08, 2026 10:34 AM

दिल्ली। दुनिया के नक्शे पर छिड़ी जंग की तपिश अब भारतीय खेतों तक न पहुंचे, इसके लिए केंद्र सरकार ने मोर्चा संभाल लिया है। मिडल ईस्ट (मध्य पूर्व) में बढ़ते तनाव ने खाद की वैश्विक सप्लाई चेन को हिलाकर रख दिया है, जिससे भारत में यूरिया और डीएपी की उपलब्धता पर सवाल उठने लगे थे। हालांकि, सरकार ने समय रहते 'एक्टिव मोड' में आते हुए 25 लाख मीट्रिक टन यूरिया की खरीदारी के लिए बड़ा ग्लोबल टेंडर जारी कर दिया है। यह कदम इसलिए भी अहम है क्योंकि भारत अपनी जरूरत का करीब 50 फीसदी यूरिया और डीएपी इन्हीं खाड़ी देशों से मंगवाता है।

जून की बुवाई के लिए एडवांस प्लानिंग: आईपीएल ने जारी किया टेंडर

सरकारी कंपनी इंडियन पोटाश लिमिटेड (IPL) ने इस शनिवार को जो टेंडर निकाला है, उसके तहत 15 लाख टन यूरिया पश्चिमी तट और 10 लाख टन पूर्वी तट के बंदरगाहों के जरिए देश में लाया जाएगा। असल में जून में मानसून की पहली फुहार के साथ ही देश के बड़े हिस्से में धान, मक्का और सोयाबीन की बुवाई का सीजन शुरू हो जाता है। उस वक्त खाद की मांग अपने चरम पर होती है। सरकार का लक्ष्य है कि सप्लाई चेन में आ रही रुकावटों का असर घरेलू स्टॉक पर न पड़े, ताकि ऐन वक्त पर किसानों को लंबी लाइनों में न लगना पड़े।

स्टॉक की स्थिति: घबराने की जरूरत नहीं, विकल्प तैयार हैं

केमिकल्स और फर्टिलाइजर मंत्रालय ने साफ किया है कि देश में फिलहाल खाद का पर्याप्त भंडार मौजूद है। आंकड़ों की मानें तो ग्रीष्मकालीन सीजन के लिए करीब 3.9 करोड़ मीट्रिक टन खाद की जरूरत होगी, जबकि हमारे पास 1.8 करोड़ टन का स्टॉक पहले से ही है—जो पिछले साल के मुकाबले काफी बेहतर स्थिति में है। भारत ने केवल मिडल ईस्ट पर निर्भर न रहकर रूस, मोरक्को, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और मिस्र जैसे देशों के साथ भी लंबी अवधि के समझौते (Long-term Deals) किए हैं, जो किसी भी आपात स्थिति में सप्लाई बैकअप का काम करेंगे।

घरेलू उत्पादन और सब्सिडी की चुनौती

हालांकि, घरेलू मोर्चे पर एक छोटी चुनौती यूरिया उत्पादन में आई गिरावट है। वर्तमान में मासिक उत्पादन 18 लाख टन के स्तर पर है, जो सामान्यतः 24 लाख टन रहता है। इसकी बड़ी वजह यूरिया बनाने में इस्तेमाल होने वाली एलएनजी (LNG) गैस की आपूर्ति में कमी है, जिसका आधा हिस्सा मिडल ईस्ट से आता है। राहत की बात यह है कि मेंटेनेंस के बाद कई बंद पड़े प्लांट दोबारा शुरू हो रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वैश्विक बाजार में कच्चे माल की कीमतें बढ़ने के बावजूद सरकार ने साफ कर दिया है कि किसानों को यूरिया और डीएपी पुरानी सब्सिडाइज्ड दरों पर ही मिलता रहेगा।

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