Friendship Day: फ्रेंडशिप डे पर याद करें कृष्ण-सुदामा की जोड़ी, जानिए क्यों आज भी सबसे मिसाल है यह दोस्ती
फ्रेंडशिप डे पर याद करें कृष्ण-सुदामा की जोड़ी
Friendship Day: आज के डिजिटल और भागदौड़ भरे दौर में दोस्ती के पैमाने काफी हद तक बदल चुके हैं। अक्सर लोग अपना सोशल स्टेटस, करियर, आय और सहूलियतें देखकर रिश्ते तय करते हैं। कई बार तो यह माना जाने लगा है कि दोस्ती तभी लंबी टिकती है जब दोनों पक्षों का आर्थिक और सामाजिक स्तर एक जैसा हो। हालांकि, भारतीय संस्कृति में दर्ज भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की ऐतिहासिक मित्रता इस संकीर्ण सोच को पूरी तरह खारिज करती है। यह अमर कथा बताती है कि सच्ची आत्मीयता कभी धन, पद या ओहदे की मोहताज नहीं होती।
गुरुकुल के सहपाठी से द्वारकाधीश बनने तक: नहीं बदला मन का अपनापन
सांदीपनि ऋषि के आश्रम में एक साथ शिक्षा ग्रहण करने वाले कृष्ण और सुदामा के रास्ते आगे चलकर पूरी तरह जुदा हो गए। एक तरफ श्रीकृष्ण द्वारका के वैभवशाली सम्राट बने, तो दूसरी तरफ सुदामा बेहद कंगाली और विपन्नता में जीवन बिताते रहे। दोनों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में जमीन-आसमान का अंतर आ चुका था, लेकिन वक्त की इस आंधी में भी उनके दिल का अपनापन रत्ती भर कम नहीं हुआ। सुदामा जब अपनी पत्नी के कहने पर झिझकते हुए द्वारका पहुंचे, तो उनके पास भेंट के रूप में देने के लिए सिर्फ मुट्ठी भर सूखे चावल (पोहा) ही थे।
राजसी अहंकार को किनारे रख नंगे पैर दौड़े कृष्ण, मित्र के धोए चरण
जैसे ही द्वारपालों ने सुदामा के आने की सूचना दी, श्रीकृष्ण ने अपने सारे राजसी वैभव और मर्यादाओं को एक तरफ दरकिनार कर दिया। वे नंगे पांव अपने बालसखा की ओर दौड़ पड़े। द्वारकाधीश ने सुदामा को गले से लगाया, उन्हें सिंहासन पर बैठाकर अपने आंसुओं से उनके पैर पखारे और बड़े चाव से वह साधारण सा उपहार स्वीकार किया। यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि इंसान का पद या प्रतिष्ठा कितनी भी बड़ी क्यों न हो जाए, सच्चे मित्र के आगे अहंकार हमेशा बौना ही रहता है।
बिना मांगे मदद और आत्मसम्मान की रक्षा: यही है दोस्ती का असली धर्म
सुदामा श्रीकृष्ण के दरबार में कुछ मांगने नहीं गए थे और न ही उन्होंने अपनी गरीबी का रोना रोया। वहीं दूसरी ओर, श्रीकृष्ण ने अपने मित्र के स्वाभिमान को बिना ठेस पहुंचाए, बिन मांगे ही उनकी सारी दरिद्रता को दूर कर दिया। आज के समय में जब रिश्ते लेन-देन और उम्मीदों के तराजुओं पर तोले जाते हैं, तब कृष्ण-सुदामा का यह रिश्ता सिखाता है कि मदद ऐसी हो जो सामने वाले के सम्मान को कभी ठेस न पहुंचाए। यदि मित्र की सफलता पर ईर्ष्या के बजाय गर्व महसूस हो और कठिन परिस्थिति में बिना बुलाए साथ खड़े होने का जज्बा हो, वही रिश्ता असल मायनों में ताउम्र कायम रहता है।
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