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बच्चा नहीं मान रहा आपकी बात? एक्सपर्ट्स से जानिए ये कड़वी बात हर घर का सच है

Jun 12, 2026 6:09 PM

Parenting Advice: सिनेमाई पर्दे पर 'सर्किट' जैसे किरदारों को जीवंत करने वाले अरशद वारसी अपनी निजी जिंदगी में काफी संजीदा पिता हैं। हाल ही में उन्होंने आधुनिक दौर की पेरेंटिंग यानी परवरिश को लेकर एक ऐसी कड़वी सच्चाई बयां की है, जो आज के दौर में हर घर की कहानी बन चुकी है। अरशद ने कहा कि अमूमन माता-पिता अपने बच्चों को तभी तक बहुत प्यार करते हैं, जब तक वे उनके इशारों पर नाचते हैं। जैसे ही बच्चे किशोरावस्था (टीनएज) में कदम रखते हैं और उनका अपना एक स्वतंत्र दिमाग और राय विकसित होती है, वैसे ही माता-पिता उनसे चिढ़ने लगते हैं। असल में यह चिढ़ इस बात की होती है कि अब बच्चा उनके सांचे में ढलने से इनकार कर रहा है।

'सुधार' की आड़ में 'पावर गेम' खेल रहे हैं आज के पेरेंट्स

अपनी बात को और गहराई से समझाते हुए अरशद वारसी कहते हैं कि ज्यादातर मामलों में माता-पिता बच्चों को सही रास्ता नहीं दिखा रहे होते, बल्कि वे अपने 'पेरेंट्स' होने के अहंकार और पावर का प्रदर्शन कर रहे होते हैं। उनके दिमाग में यह बात बैठ जाती है कि 'इस बच्चे की इतनी हिम्मत कैसे हुई कि इसने मेरी बात नहीं सुनी?' अरशद ने सवाल उठाया कि बच्चे का किसी बात पर 'ना' कहना या अपनी असहमति जताना हमेशा अशिष्टता या बगावत क्यों मान लिया जाता है? इसे एक सामान्य मानवीय स्वभाव के तौर पर क्यों नहीं देखा जाता?

क्या कहते हैं पेरेंटिंग एक्सपर्ट्स? समझिए बड़ा होने का विज्ञान

मनोवैज्ञानिक और पेरेंटिंग एक्सपर्ट्स भी अभिनेता अरशद वारसी के इस नजरिए से पूरी तरह इत्तेफाक रखते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं, वे निर्भरता से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते हैं। इस सफर में उनका नियमों पर सवाल उठाना या माता-पिता से अलग राय रखना इस बात का पुख्ता सबूत है कि उनका आत्म-सम्मान और सोचने की क्षमता मजबूत हो रही है। यह इस बात का भी संकेत है कि बच्चा घर के माहौल में खुद को इतना सुरक्षित महसूस करता है कि वह बिना किसी डर के अपनी बात खुलकर रख पा रहा है। अगर इस मोड़ पर उनकी आवाज को दबाया गया, तो वे कुंठा का शिकार होकर वाकई में बागी बन सकते हैं।

हुक्म चलाने के बजाय संवाद का जरिया बनें माता-पिता

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, माता-पिता को यह समझना होगा कि परवरिश का मतलब सिर्फ लाड़-प्यार या सिर्फ कड़े नियम थोपना नहीं है। बच्चों को उम्र के हिसाब से छोटे-मोटे फैसले लेने की आजादी देनी चाहिए और अगर वे गलत फैसला लें, तो डांटने के बजाय उन्हें उसके परिणामों से रूबरू कराना चाहिए। घर में अनुशासन के नियम जरूर हों, लेकिन उनके पीछे का तार्किक कारण भी बच्चों को पता होना चाहिए। इसलिए, अगर आपका बच्चा भी इन दिनों आपकी हर बात पर 'जी हुजूर' नहीं कह रहा है, तो पैनिक होने की जरूरत नहीं है। थोड़ा सा धैर्य, संयम और दोस्ताना व्यवहार आपके और आपके बच्चे के रिश्ते को हमेशा के लिए मजबूत बना सकता है।

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