160 बच्चों को बाल मजदूरी और भिक्षावृत्ति के दलदल से छुड़ाया, कई फैक्ट्री मालिकों पर केस दर्ज
Jun 12, 2026 5:34 PM
नीलोखेड़ी (महाबीर मैहला)। नीलोखेड़ी और करनाल के औद्योगिक क्षेत्रों, ढाबों और व्यस्त बाजारों में सुबह-सुबह चाय की केतली उठाते या कारखानों में अपनी उम्र से भारी काम करते बच्चों के हाथों को अब कलम मिलने की उम्मीद जगी है। 'विश्व बाल श्रम निषेध दिवस' के मौके पर सामने आए आंकड़े चौंकाने वाले भी हैं और राहत देने वाले भी। हरियाणा सरकार के सख्त निर्देशों के बाद प्रशासन, पुलिस और एमडीडी ऑफ इंडिया (MDD of India) की संयुक्त टीमों ने पिछले 14 महीनों में जिले के कोने-कोने में गुप्त छापेमारी की। इस दौरान कई ऐसी फैक्ट्रियां और दुकानें रडार पर आईं, जहां मासूमों से बेहद अमानवीय और शोषणकारी परिस्थितियों में दिन-रात काम कराया जा रहा था।
मामूली मजदूरी और 12-12 घंटे का टॉर्चर
रेस्क्यू किए गए बच्चों की दास्तान सुनकर किसी भी संवेदनशील इंसान की रूह कांप जाए। पांच से अठारह साल की उम्र के इन बच्चों को न तो पेट भर खाना मिलता था और न ही कोई बुनियादी सहूलियत। जांच में यह कड़वा सच सामने आया कि इन बच्चों को मामूली दिहाड़ी या सिर्फ दो वक्त की रोटी के एवज में सुबह से देर रात तक खटाया जाता था। इस शारीरिक और मानसिक टॉर्चर का सीधा असर उनके स्वास्थ्य और मानसिक विकास पर पड़ रहा था। खेलने-कूदने की उम्र में इन बच्चों का बचपन अंधेरे कमरों में सिमट कर रह गया था।
"ढाबों या सड़कों पर नहीं, स्कूलों में है बच्चों की जगह"
इस सफल अभियान पर बात करते हुए एमडीडी ऑफ इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) सुरेंद्र सिंह मान ने बेबाकी से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा, "छुड़ाया गया हर एक बच्चा इस बात का सबूत है कि हम समाज से इस कलंक को मिटा सकते हैं। बच्चों की असली जगह फैक्ट्रियों के धुएं या ढाबों के बर्तनों के बीच नहीं, बल्कि स्कूल की बेंच पर है। बाल श्रम और मानव तस्करी (चाइल्ड ट्रैफिकिंग) दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब तक समाज और प्रशासन मिलकर आंखें नहीं खोलेंगे, तब तक तस्कर सक्रिय रहेंगे।" उन्होंने साफ किया कि बच्चों को सिर्फ छुड़ाना मकसद नहीं है, बल्कि उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ना असली चुनौती है।
तस्करों पर देशव्यापी शिकंजा: पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू
यह पूरी मुहिम देश के सबसे बड़े बाल अधिकार नेटवर्क 'जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन' (JRC) के खुफिया और निगरानी तंत्र की वजह से मुमकिन हो सकी है। इस नेटवर्क की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले तीन सालों (2023 से 2026) में इसने देश भर से करीब 1.45 लाख बच्चों को तस्करों और शोषकों के चंगुल से आजाद कराया है। करनाल में जिन जगहों से बच्चों को छुड़ाया गया है, उन प्रतिष्ठानों के मालिकों के खिलाफ बाल श्रम कानून और किशोर न्याय (जेजे) एक्ट के तहत सख्त कानूनी मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं। फिलहाल, सभी 160 बच्चों की काउंसलिंग कराई जा रही है और उनके मुफ्त पुनर्वास, शिक्षा, स्वास्थ्य लाभ और सरकारी मुआवजा दिलाने की कागजी कार्रवाई तेज कर दी गई है।