बिना पैरों के सिर्फ हाथों के बल पर नाप दिया एवरेस्ट, रूस के पूर्व सैनिक रुस्तम नाबिएव ने रचा नया इतिहास
May 22, 2026 12:40 PM
ट्रैवल। आमतौर पर पहाड़ों को लांघने के लिए मजबूत कदमों और बेहतरीन ट्रैकिंग गियर्स की जरूरत होती है, लेकिन रूस के रुस्तम नाबिएव ने यह साबित कर दिया कि चोटियों पर पहुंचने के लिए पैरों से ज्यादा मजबूत इरादों की जरूरत होती है। नेपाल में जारी इस साल के पर्वतारोहण सीजन के बीच, रुस्तम ने 20 मई की सुबह 8 बजकर 16 मिनट पर जब माउंट एवरेस्ट (8,848.86 मीटर) के शिखर पर कदम रखा, तो एक नया वैश्विक इतिहास रच गया। दोनों पैर न होने के बावजूद, उन्होंने बिना किसी कृत्रिम पैर के सिर्फ अपनी फौलादी बाहों के सहारे इस खतरनाक सफर को अंजाम दिया। इंटरनेट पर उनकी चढ़ाई का जो वीडियो वायरल हो रहा है, उसे देखकर पूरी दुनिया की आंखें नम हैं और लोग उनकी हिम्मत को सलाम कर रहे हैं।
मौत के मुंह से वापसी और व्हीलचेयर को चुनौती
रुस्तम के इस शिखर तक पहुंचने का रास्ता उनके जीवन के सबसे अंधेरे दौर से होकर गुजरता है। साल 2015 में रूस के ओम्स्क शहर में एक सैन्य बैरक की चार मंजिला इमारत अचानक ताश के पत्तों की तरह ढह गई थी। इस भीषण हादसे में 24 युवा सैनिकों की मौत हो गई थी। रुस्तम को मलबे से जिंदा तो निकाल लिया गया, लेकिन डॉक्टरों को उनकी जान बचाने के लिए उनके दोनों पैर कूल्हे के पास से काटने पड़े। कई दिनों तक कोमा में रहने के बाद जब उन्हें होश आया, तो जिंदगी बदल चुकी थी। हालांकि, उन्होंने खुद को घर की चार दीवारों या व्हीलचेयर तक सीमित रखने के बजाय उन गगनचुंबी पहाड़ों को चुनौती देने की ठानी, जहां अच्छे-भले पेशेवरों के पैर कांप जाते हैं।
खुंबू आइसफॉल की वो 15 घंटे की जानलेवा जंग
एवरेस्ट बेस कैंप के अधिकारियों और शेरपाओं के मुताबिक, रुस्तम की यह पूरी यात्रा हाड़ कंपाने वाली ठंड, बेहद कम ऑक्सीजन और सीधे तौर पर मौत के साए के बीच पूरी हुई। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में इस जांबाज के असली संघर्ष की झलक मिलती है। रुस्तम सिर्फ अपनी हथेलियों और बाहों के जोर पर एवरेस्ट के सबसे खतरनाक और अनिश्चित हिस्से 'खुंबू हिमपात' (Khumbu Icefall) को पार करते दिख रहे हैं। बर्फ की विशाल दरारों (Crevasses) के ऊपर बंधी एल्युमिनियम की डगमगाती सीढ़ियों पर बिना पैरों के, सिर्फ हाथों से खुद को आगे खींचना किसी चमत्कार से कम नहीं था। आम पर्वतारोही जिस रास्ते को कुछ घंटों में पार कर लेते हैं, वहां सिर्फ हाथों के बल रेंगते हुए कैंप-1 (6,065 मीटर) तक पहुंचने में रुस्तम को लगातार 15 घंटे का समय लगा।
इतिहास के पन्नों में दर्ज हुआ रुस्तम का नाम
अंतरराष्ट्रीय पर्वतारोहण के इतिहास में दिव्यांग खिलाड़ियों ने पहले भी कमाल किए हैं। इससे पहले नेपाल के पूर्व ब्रिटिश गोरखा सैनिक हरि बुद्धा मगर ने कृत्रिम पैरों (प्रोस्थेटिक्स) की मदद से एवरेस्ट फतह कर सुर्खियां बटोरी थीं। लेकिन बिना किसी बनावटी पैर के, सीधे अपने शरीर को हाथों से खींचते हुए एवरेस्ट के टॉप पर पहुंचने वाले रुस्तम नाबिएव दुनिया के इकलौते और पहले पर्वतारोही बन गए हैं। एवरेस्ट से पहले वह नेपाल की ही बेहद तकनीकी और कठिन चोटी 'माउंट मनास्लू' (8,163 मीटर) और यूरोप के सबसे ऊंचे पर्वत 'माउंट एल्ब्रस' (5,642 मीटर) पर भी सिर्फ हाथों के दम पर तिरंगा और रूसी झंडा फहरा चुके हैं।
शिखर से दिया दुनिया को सबसे बड़ा सबक
माउंट एवरेस्ट के उच्चतम बिंदु पर पहुंचकर रुस्तम भावुक हो गए और उन्होंने अपनी इस जीत को उन सभी लोगों को समर्पित किया जो जीवन में निराशा से जूझ रहे हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, "मैं यह जीत उन सभी लोगों के नाम करता हूं जो मुझे देख रहे हैं। मैं दुनिया से बस एक ही बात कहना चाहता हूं कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत हों, जब तक शरीर में आखिरी सांस बाकी है, तब तक लड़ते रहो। हार न मानने का यह प्रयास हमेशा सार्थक होता है और सफलता एक दिन आपके कदम जरूर चूमती है।"