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असम की तेजपुर लीची की दुबई में एंट्री: जीआई टैग वाले इस फल की 1 टन खेप खाड़ी देश रवाना

Jun 10, 2026 1:26 PM

असम के बागानों की खुशबू अब सात समंदर पार खाड़ी देशों के बाजारों को महकाने लगी है। भारत सरकार के वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने पूर्वोत्तर के कृषि परिदृश्य को एक नई ऊंचाई देते हुए असम की प्रसिद्ध 'तेजपुर लीची' का अंतरराष्ट्रीय बाजार में आधिकारिक आगाज करा दिया है। सरकारी एजेंसी के माध्यम से तैयार की गई एक टन उच्च गुणवत्ता वाली तेजपुर लीची की पहली खेप को सीधे दुबई (यूएई) के बाजार के लिए रवाना किया गया। सरकार की इस रणनीतिक पहल को न केवल पूर्वोत्तर के कृषि निर्यात के लिहाज से एक टर्निंग पॉइंट माना जा रहा है, बल्कि इससे असम के सुदूर इलाकों में पारंपरिक खेती कर रहे छोटे किसानों की तकदीर बदलने के रास्ते भी खुल गए हैं।

क्यों खास है तेजपुर की यह 'रेड विंटेज'?

आम बाजारों में मिलने वाली सामान्य लीची के मुकाबले तेजपुर की लीची को फलों की दुनिया का 'प्रीमियम क्लास' माना जाता है। तेजपुर क्षेत्र की अनूठी मिट्टी और यहां की जलवायु इस फल को एक खास बनावट देती है।

इसकी विशिष्टताओं का जिक्र करते हुए कृषि निर्यात विशेषज्ञों ने बताया:

"तेजपुर की लीची अपने चमकीले आकर्षक लाल रंग, बेहद बारीक बीज (गुठली), रसदार गूदे और एक अनोखी मनमोहक खुशबू के लिए जानी जाती है। विदेशी बाजारों, खासकर दुबई जैसे हाई-एंड लिक्वरेटिव मार्केट्स में ऐसे ऑर्गेनिक और विशिष्ट स्वाद वाले फलों की भारी मांग रहती है, जहां उपभोक्ता गुणवत्ता के लिए दोगुनी कीमत देने को भी तैयार रहते हैं। तेजपुर लीची इस अंतरराष्ट्रीय मापदंड पर पूरी तरह खरी उतरती है।"

जीआई टैग बना वैश्विक साख का आधार

न्यूज एजेंसी पीटीआई-भाषा के अनुसार, वाणिज्य मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि इस फल को मिला 'भौगोलिक संकेतक' यानी जीआई (GI) टैग अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के बीच भरोसा कायम करने में सबसे बड़ा हथियार साबित हुआ है। जीआई टैग यह प्रमाणित करता है कि इस उत्पाद की क्रेडिबिलिटी और औषधीय व स्वाद संबंधी गुण केवल और केवल तेजपुर की आबोहवा से ही मुमकिन हैं। इस टैग के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पायरेसी या नकली ब्रांडिंग का खतरा खत्म हो जाता है, जिससे वैश्विक सुपरमार्केट्स सीधे असम के किसानों से व्यापार करने को प्राथमिकता दे रहे हैं।

बॉम्बैया से लेकर शाही तक: किस्मों की अनूठी विविधता

तेजपुर और उसके आसपास के बेल्ट में लीची की बागवानी का सदियों पुराना इतिहास है। यहां मुख्य रूप से पांच अनूठी किस्में उगाई जाती हैं, जिनमें:

बॉम्बैया और शाही: अपने बड़े आकार और अत्यधिक मिठास के कारण निर्यात के लिए सबसे मुफीद मानी जाती हैं।

इलायची, बिलाती और पियाजी: अपने अलग स्वाद और बनावट के कारण घरेलू और स्थानीय बाजारों में अपनी धाक रखती हैं।

इन सभी किस्मों की वैज्ञानिक ढंग से की जा रही ग्रेडिंग और पैकेजिंग ने अब इसे अंतरराष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स के अनुकूल बना दिया है।

पूर्वोत्तर के 'लुक ईस्ट' से 'ग्लोबल रीच' तक का सफर

यह निर्यात केवल एक कमर्शियल डील नहीं है, बल्कि केंद्र सरकार की उस वृहद आर्थिक नीति का हिस्सा है जिसके तहत पूर्वोत्तर (North-East) के राज्यों को 'देश का नया एक्सपोर्ट हब' बनाने का खाका खींचा गया था। वाणिज्य मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, तेजपुर लीची की तर्ज पर ही असम के काजी नेमू (नींबू), जोहा चावल और नागालैंड की राजा मिर्च जैसी फसलों को भी वैश्विक बाजारों में लगातार प्रमोट किया जा रहा है।

इस सफल ट्रायल के बाद अब कोल्ड चेन इंफ्रास्ट्रक्चर, आधुनिक पैकेजिंग हाउस और सीधे हवाई संपर्क को मजबूत किया जा रहा है। इससे न केवल बागवानों को बिचौलियों से मुक्ति मिलेगी और उनकी आय कई गुना बढ़ेगी, बल्कि ग्रामीण असम में प्रोसेसिंग, लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्टेशन के क्षेत्र में युवाओं के लिए रोजगार के नए साधन भी विकसित होंगे।

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