- by Vinita Kohli
- Dec, 06, 2025 04:06
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने आज यानी गुरुवार को यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) द्वारा हाल ही में जारी किए गए नए नियमों पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। यह रोक न्यायालय ने इसलिए लगाई क्योंकि नियमों के कुछ प्रावधान स्पष्ट नहीं हैं और उनका गलत इस्तेमाल होने का खतरा है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और UGC दोनों को नोटिस जारी किया और निर्देश दिया कि नियमों का नया ड्राफ्ट तैयार किया जाए, ताकि वे ज्यादा स्पष्ट और निष्पक्ष हों।
नियमों में अस्पष्टता और संभावित दुरुपयोग
CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या की बेंच ने यह टिप्पणी की कि वर्तमान नियमों में कई प्रावधान इतने अस्पष्ट हैं कि उनका गलत तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है। न्यायालय ने केंद्र से सवाल किया कि हमने जातिविहीन समाज की दिशा में कितनी प्रगति की है और क्या इन नियमों के कारण हम उल्टी दिशा में तो नहीं जा रहे हैं। यह सवाल इस बात की ओर इशारा करता है कि न्यायालय सामाजिक समता और नियमों की निष्पक्षता के बीच संतुलन बनाए रखना चाहता है।
UGC के नए नियमों का उद्देश्य और प्रावधान
UGC ने 13 जनवरी 2026 को ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन्स, 2026’ नाम से नए नियम जारी किए। इन नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में SC, ST और OBC छात्रों के खिलाफ जातिगत भेदभाव को रोकना था। नए नियमों के तहत कॉलेज और यूनिवर्सिटी में विशेष समितियां, हेल्पलाइन और मॉनिटरिंग टीम बनाने के निर्देश दिए गए, ताकि इन छात्रों की शिकायतों का त्वरित और उचित निपटारा किया जा सके।
सवर्ण छात्रों में विरोध और याचिकाएं
इन नए नियमों के लागू होने के बाद सवर्ण जाति के छात्रों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। उनका कहना है कि नए नियमों के कारण उन्हें ‘स्वाभाविक अपराधी’ माना जाने का खतरा है और ये नियम सवर्ण छात्रों के खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा दे सकते हैं। इसके साथ ही कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर की गईं, जिसमें आरोप लगाया गया कि UGC ने जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा में गैर-समावेशी दृष्टिकोण अपनाया है और इससे कॉलेजों में अराजकता फैल सकती है।
सरकार की दलील और न्यायालय का संतुलन
सरकार का कहना है कि ये बदलाव उच्च शिक्षा संस्थानों में निष्पक्षता और जवाबदेही लाने के लिए किए गए हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नियमों में अस्पष्टता और संभावित दुरुपयोग को देखते हुए इन्हें तत्काल लागू नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि नए नियम सामाजिक समता को बढ़ावा देने के साथ-साथ सभी छात्रों के अधिकारों और सुरक्षा का संतुलन बनाए रखें।
UGC ने कॉलेज में जातीय भेदभाव को लेकर नए नियम क्यों बनाए?
17 जनवरी 2016 को हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट रोहित वेमुला ने जातीय उत्पीड़न के चलते आत्महत्या कर ली। इसी तरह 22 मई 2019 को महाराष्ट्र में दलित डॉक्टर पायल तडवी ने भी आत्महत्या कर ली। 29 अगस्त 2019 को रोहित वेमुला और पायल तडवी के परिजनों ने कॉलेज में जातीय भेदभाव के नियमों को सख्त बनाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की। इसी साल IIT ने एक स्टडी की, जिसमें पाया गया कि ‘ऐतिहासिक रूप से वंचित जातियों के 75% छात्र कॉलेज में भेदभाव का सामना करते हैं।’ जनवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस सूर्यकांत की अगुआई वाली बेंच ने UGC को जातीय भेदभाव की शिकायतों का डेटा इकठ्ठा करने को कहा, साथ ही नए नियम बनाने का निर्देश दिया। फरवरी 2025 में फीडबैक लेने के लिए इन नए नियमों का एक ड्राफ्ट जारी किया गया।
‘ऑल इंडिया OBC स्टूडेंट यूनियन’ का कहना था कि ड्राफ्ट के तहत यूनिवर्सिटीज में जातिगत भेदभाव की परिभाषा में OBC को शामिल नहीं किया गया है, साथ ही कॉलेज में भेदभाव के मामलों पर कार्रवाई के लिए जो इक्वलिटी कमेटी बनाई जानी हैं, उनमें भी OBC मेंबर शामिल करने का प्रावधान नहीं है। ड्राफ्ट में जातीय भेदभाव की झूठी शिकायत करने पर दंड का प्रावधान था। इस पर कहा गया कि इससे भेदभाव का सामना कर रहे स्टूडेंट्स शिकायत करने से डरेंगे। ड्राफ्ट में जातीय भेदभाव की कोई स्पष्ट परिभाषा भी नहीं थी।
संसद की शिक्षा, महिला, बाल और युवा संबंधी मामलों की संसदीय समिति ने ड्राफ्ट की समीक्षा करने के बाद इसे 8 दिसंबर 2025 को केंद्र सरकार को सौंपा। कांग्रेस के राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह इस समिति के चेयरमैन थे। समिति ने UGC को अपनी सिफारिशें दीं, जिनमें कहा गया कि भेदभाव वाले नियम की परिभाषा और इक्विटी कमेटी में OBC को भी शामिल किया जाए। इसके बाद UGC ने ड्राफ्ट में कई बदलाव करके 13 जनवरी 2026 को नए नियम नोटिफाई कर दिए। 15 जनवरी से ये नियम UGC से मान्यता प्राप्त सभी कॉलेज और यूनिवर्सिटीज में लागू हो गए हैं।