Search

क्यों लगाई जाती है ठंडे-मीठे पानी की छबील? जानिए गुरु अर्जुन देव जी से जुड़ा ये भावुक इतिहास

May 30, 2026 12:50 PM

उत्तर भारत में जब मई और जून के महीने में सूरज आग उगलता है, तब सिख समुदाय द्वारा जगह-जगह राहगीरों को ठंडा और मीठा पानी (कच्ची लस्सी या शरबत) पिलाने के लिए स्टॉल लगाए जाते हैं, जिन्हें 'छबील' कहा जाता है। अमूमन लोग इसे सिर्फ गर्मी से राहत देने का एक जरिया मानते हैं, लेकिन इस महान सेवा के पीछे सिखों के पांचवें गुरु, श्री गुरु अर्जुन देव जी की शहादत का एक बेहद भावुक और ऐतिहासिक प्रसंग छिपा हुआ है। यह परंपरा सिर्फ प्यास बुझाने की नहीं, बल्कि जुल्म के खिलाफ शांति और सेवा भाव से लड़ने की गवाही देती है।

जब तवे पर बैठे गुरु जी के लिए शरबत लेकर पहुंची चंदू की पुत्रवधू

ऐतिहासिक घटनाक्रम के मुताबिक, जब मुगल बादशाह जहांगीर के आदेश पर गुरु अर्जुन देव जी को लाहौर में तपती लोहे की तवे पर बिठाकर और उबलते पानी में डालकर अमानवीय यातनाएं दी जा रही थीं, तब इस घोर पाप में शामिल पापी चंदू की पुत्रवधू का दिल तड़प उठा। वह छिपते-छिपाते गुरु जी के पास पहुंची और अत्यंत व्याकुल होकर उनसे थोड़ा सा ठंडा शरबत पीने की मिन्नत करने लगी ताकि उनके छाले पड़ चुके शरीर को थोड़ी शांति मिल सके।

गुरु जी का वह ऐतिहासिक वचन: 'लाखों लोग पीएंगे तुम्हारे नाम का शरबत'

क्रूर यातनाओं के बीच भी अडिग और शांत बैठे गुरु अर्जुन देव जी ने उस महिला की श्रद्धा और तड़प को देखा। तब गुरु जी ने बहुत ही धीमे और शांत स्वर में वचन दिया, "माता! इस मुख से तो मैं तुम्हारा यह शरबत नहीं पीयूंगा, पर हां, इतिहास में एक समय ऐसा जरूर आएगा जब यह जो शरबत तुम आज मेरे लिए लेकर आई हो, तुम्हारे इस सेवा भाव के नाम पर दुनिया भर में हजारों लोग इस शरबत को राहगीरों को पिलाएंगे और लाखों लोग इसे पीएंगे। तुम्हारी यह सेवा और तड़प हमेशा के लिए सफल होगी।" गुरु जी के इसी पावन वचन के बाद से हर साल उनके शहीदी दिवस पर दुनिया भर में मीठे पानी की छबीलें लगाने की परंपरा शुरू हुई।

तानों के डर से पुत्रवधू ने भी त्याग दिए थे प्राण

शरबत न पीने के बाद जब चंदू की पुत्रवधू बेहद भावुक हो गई, तो उसने गुरु जी के चरणों में एक और अंतिम विनती रखी। उसने कहा, "महाराज, मुझे पता है कि कल आपको शहीद कर दिया जाएगा। मेरी आपसे बस एक ही प्रार्थना है कि कल जब आप इस नश्वर संसार को छोड़कर अपनी देह रूपी चोला त्यागेंगे, तो मैं भी उसी क्षण अपने प्राण छोड़ दूं। मैं समाज के और लोगों के ये ताने सहते हुए जिंदा नहीं रह सकती कि देखो यह पापी चंदू की बहू जा रही है, जिसके ससुर ने हमारे गुरु अर्जुन देव जी को इतनी बेरहमी से शहीद करवाया।"

गुरु जी की शहादत के साथ ही अमर हो गई वह आत्मा

इतिहास गवाह है कि अगले दिन जब पांचवें पातशाह श्री गुरु अर्जुन देव जी ने रावी नदी के ठंडे पानी में डुबकी लगाकर अपनी शहादत दी, तो ठीक उसी समय दूसरी तरफ चंदू की उस पुत्रवधू ने भी संसार से विदा ले ली और अपना शरीर त्याग दिया। गुरु जी ने अपनी शहादत से पहले ही उसके कलंक को धोकर उसकी सेवा को अमर कर दिया था। यही वजह है कि आज सदियों बाद भी जब भीषण गर्मी में छबीलें लगती हैं, तो वह उसी निश्छल सेवा और गुरु वचन की याद दिलाती हैं।

You may also like:

Please Login to comment in the post!