हाइड्रोजन ट्रेन के संचालन की समय सीमा फिर बढ़ी, जींद प्लांट में तकनीकी दिक्कतों से थमे पहिए
May 22, 2026 11:51 AM
हरियाणा। भारतीय रेलवे के इतिहास में मील का पत्थर मानी जा रही देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन परियोजना को एक बार फिर बड़ा झटका लगा है। हरियाणा के जींद में इस महत्वाकांक्षी ट्रेन को ईंधन देने के लिए जो विशेष प्लांट लगाया गया था, वह फिलहाल अपनी उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पा रहा है। प्लांट के भीतर पानी से आवश्यक मात्रा में हाइड्रोजन गैस का उत्पादन नहीं हो पा रहा है। इस तकनीकी बाधा का सीधा असर ट्रेन के ट्रैक ट्रायल पर पड़ा है, जिसके चलते रेलवे प्रशासन को एक बार फिर इसके कमर्शियल संचालन की डेडलाइन को आगे खिसकाने के लिए मजबूर होना पड़ा है।
पानी से अलग नहीं हो पा रही है गैस, क्षमता के न्यूनतम स्तर पर काम कर रहा सिस्टम
जींद में स्थापित इस अत्याधुनिक प्लांट को इस तरह डिजाइन किया गया था कि यह पानी से इलेक्ट्रोलीसिस प्रक्रिया के जरिए शुद्ध हाइड्रोजन गैस तैयार करे। मगर, जमीनी स्तर पर तकनीकी अड़चनों ने इंजीनियरों के सामने नई मुसीबत खड़ी कर दी है। प्लांट के भीतर पानी से उतनी मात्रा में हाइड्रोजन गैस अलग नहीं हो पा रही है, जो ट्रेन की हाई-स्पीड टेस्टिंग और सुचारू संचालन के लिए पर्याप्त हो। हालत यह है कि करोड़ों की लागत से बना यह प्लांट अभी अपनी कुल तय उत्पादन क्षमता के बेहद निचले स्तर पर रेंग रहा है, जिससे ईंधन का बड़ा संकट खड़ा हो गया है।
ट्रायल के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भरता, टैंकरों के भरोसे रेलवे का ड्रीम प्रोजेक्ट
इस ईंधन संकट का तात्कालिक समाधान निकालने के लिए रेलवे को अब बाहरी राज्यों का रुख करना पड़ रहा है। ट्रेन का परीक्षण बीच में न रुके, इसके लिए पुणे और चेन्नई से विशेष टैंकरों के जरिए हाइड्रोजन गैस जींद मंगवाई जा रही है। लंबी दूरी से गैस आयात करने की इस मजबूरी ने न सिर्फ परियोजना के बजट को प्रभावित किया है, बल्कि पूरी संचालन व्यवस्था के समय चक्र को भी बिगाड़ कर रख दिया है। अधिकारी अब इस कोशिश में जुटे हैं कि पुणे और चेन्नई से आने वाले इस बैकअप ईंधन के सहारे कम से कम जरूरी सेफ्टी ट्रायल्स को समय पर पूरा कर लिया जाए।
2600 यात्रियों की क्षमता वाली स्वदेशी तकनीक, सफलता पर टिकी हैं 35 और ट्रेनें
भले ही ईंधन को लेकर अभी मुश्किलें आ रही हों, लेकिन चेन्नई की इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF) में तैयार हुई यह ट्रेन भारतीय इंजीनियरिंग का एक नायाब नमूना है। 'मेक इन इंडिया' की तर्ज पर बनी इस ट्रेन की सबसे बड़ी खासियत इसकी विशाल वहन क्षमता है, जिसके तहत एक साथ 2600 से अधिक यात्री सफर कर सकेंगे। यह दुनिया की सबसे बड़ी हाइड्रोजन ट्रेनों में से एक है। भारतीय रेलवे का पूरा दारोमदार इस रूट की कामयाबी पर टिका है, क्योंकि इस पहले प्रयोग के सफल होते ही सरकार देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसी 35 और हाइड्रोजन ट्रेनें पटरी पर उतारने का खाका तैयार कर चुकी है।