देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को लगा झटका, जींद प्लांट में उत्पादन ठप होने से चेन्नई-पुणे से आ रहे टैंकर
May 16, 2026 1:16 PM
हरियाणा। भारतीय रेलवे की सबसे महत्वाकांक्षी और पर्यावरण-अनुकूल 'हाइड्रोजन ट्रेन' परियोजना को शुरुआती दौर में ही एक बड़े तकनीकी गतिरोध का सामना करना पड़ रहा है। हरियाणा के जींद जिले में विशेष रूप से स्थापित देश के पहले हाइड्रोजन गैस उत्पादन प्लांट में मैन्युफैक्चरिंग का काम पूरी तरह पटरी से उतर गया है। दावों के उलट, इस अत्याधुनिक प्लांट में उम्मीद और तय मानकों के अनुरूप गैस का उत्पादन नहीं हो पा रहा है। ईंधन के इस बड़े संकट के चलते पूरी परियोजना की रफ्तार धीमी पड़ गई है और रेलवे प्रशासन के सामने अब इस ट्रेन के पहियों को घुमाए रखने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
पानी से नहीं निकल पा रही गैस, पुणे और चेन्नई से आ रहे हैं टैंकर
दरअसल, इस पूरी परियोजना की नींव जींद स्थित इस प्लांट पर टिकी थी, जहां पानी से इलेक्ट्रोलिसिस (Electrolysis) की वैज्ञानिक प्रक्रिया के जरिए शुद्ध हाइड्रोजन गैस तैयार की जानी थी। मगर जमीनी हकीकत यह है कि प्लांट में लगी मशीनें पानी से आवश्यक मात्रा में हाइड्रोजन को अलग करने में नाकाम साबित हो रही हैं। स्थानीय स्तर पर ईंधन की आपूर्ति ठप होने की वजह से अब रेलवे को वैकल्पिक और बेहद खर्चीला रास्ता अपनाना पड़ रहा है। ट्रेन के जरूरी संचालन और आगामी ट्रायल्स को जिंदा रखने के लिए अब पुणे और चेन्नई जैसे सुदूर शहरों से विशेष टैंकरों के माध्यम से हाइड्रोजन गैस जींद मंगवाई जा रही है।
क्षमता से बेहद नीचे चल रहा है प्लांट, समयसीमा बढ़ी
जींद प्लांट की इस तकनीकी विफलता ने रेलवे के टाइमटेबल को पूरी तरह बिगाड़ कर रख दिया है। जानकारों के मुताबिक, प्लांट इस समय अपनी वास्तविक उत्पादन क्षमता के सबसे निचले स्तर पर काम कर रहा है। पर्यावरण को बिना नुकसान पहुंचाए शून्य-उत्सर्जन (Zero-Emission) के लक्ष्य के साथ शुरू की गई इस ग्रीन-ट्रेन के ट्रायल की तारीखें लगातार आगे खिसक रही हैं। लंबी दूरी से गैस के टैंकरों के आने में लगने वाला समय और सुरक्षा संबंधी औपचारिकताएं भी इस देरी की एक मुख्य वजह बन रही हैं, जिससे रेलवे के आला अधिकारी और तकनीकी टीमें अब भारी दबाव में हैं।
क्या दोबारा पटरी पर लौटेगी यह महत्वाकांक्षी योजना?
रेलवे के तकनीकी विशेषज्ञों और इंजीनियर्स की एक विशेष टीम फिलहाल जींद प्लांट में डेरा डाले हुए है। खराबी की मुख्य वजहों को तलाशने के साथ-साथ इलेक्ट्रोलिसिस सिस्टम के डिजाइन और वाटर इनपुट क्वालिटी की भी बारीकी से जांच की जा रही है। विभाग के सूत्रों का कहना है कि बाहर से टैंकर मंगाकर ट्रेन का ट्रायल कुछ समय के लिए तो किया जा सकता है, लेकिन कमर्शियल रन (व्यावसायिक संचालन) के लिए स्थानीय प्लांट का सुचारू होना अनिवार्य है। अब देखना होगा कि रेलवे के इंजीनियर इस तकनीकी खामी को कब तक दूर कर पाते हैं, ताकि देश की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन अपने तय रूट पर शान से दौड़ सके।