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ADA भर्ती पर हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: HPSC को मिली राहत, बदला परीक्षा का पूरा पैटर्न

May 01, 2026 3:36 PM

हरियाणा। हरियाणा में सरकारी वकील बनने का सपना देख रहे हजारों युवाओं के लिए राहत भरी खबर है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने असिस्टेंट डिस्ट्रिक्ट अटार्नी (ADA) की भर्ती प्रक्रिया पर लगी रोक हटाते हुए आयोग को प्रक्रिया जारी रखने के निर्देश दिए हैं। जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की खंडपीठ ने इस मामले में बीच का रास्ता निकालते हुए परीक्षा के पैटर्न को संशोधित किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एडीए जैसा पद पूरी तरह विधिक दक्षता (Legal Proficiency) से जुड़ा है, इसलिए चयन के पहले पायदान पर ही कानून के ज्ञान की परीक्षा लेना अनिवार्य है।

क्यों खड़ा हुआ था विवाद?

दरअसल, यह पूरा मामला उस समय कानूनी पचड़े में फंस गया था जब सिंगल बेंच ने इस भर्ती को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि स्क्रीनिंग टेस्ट में कानून विषय का न होना 'अवव्यावहारिक' है। उस समय तर्क दिया गया था कि यदि प्रारंभिक परीक्षा में केवल सामान्य ज्ञान और अन्य विषय पूछे जाएंगे, तो कानून में विशेषज्ञता रखने वाले मेधावी छात्र बाहर हो सकते हैं। एचपीएससी ने इस फैसले को खंडपीठ में चुनौती दी, जहाँ आयोग ने दलील दी कि करीब 27,500 आवेदकों की छंटनी के लिए स्क्रीनिंग टेस्ट जरूरी है।

नया एग्जाम पैटर्न: कानून के छात्रों को मिलेगा 'होम ग्राउंड' का फायदा

अदालत के ताजा निर्देश के बाद अब एडीए भर्ती तीन चरणों में होगी। पहले चरण (स्क्रीनिंग टेस्ट) में अब 50 फीसदी सवाल सीधे कानून विषय से होंगे, जबकि शेष 50 प्रतिशत में सामान्य ज्ञान, अंग्रेजी और विज्ञापन में निर्धारित अन्य विषय शामिल रहेंगे। कोर्ट ने एक और महत्वपूर्ण बदलाव यह किया है कि आयोग अब विज्ञापित पदों के मुकाबले 10 गुना उम्मीदवारों को दूसरे चरण यानी 'सब्जेक्ट नॉलेज टेस्ट' के लिए बुलाएगा। इससे ज्यादा से ज्यादा योग्य उम्मीदवारों को अपनी विशेषज्ञता साबित करने का मौका मिलेगा।

"संविधान की कसौटी और व्यावहारिक समाधान"

सुनवाई के दौरान हरियाणा के महाधिवक्ता प्रविंदर सिंह चौहान और अतिरिक्त महाधिवक्ता संजीव कौशिक ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि सरकार और आयोग चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। खंडपीठ ने माना कि स्क्रीनिंग टेस्ट का उद्देश्य केवल भीड़ को कम करना है, लेकिन इस प्रक्रिया में पद की मूल प्रकृति (Core Competency) की अनदेखी नहीं की जा सकती। सभी पक्षों की सहमति के बाद, 50 प्रतिशत कानून आधारित प्रश्नों के प्रस्ताव को अदालत ने अपनी अंतिम मुहर लगा दी है।

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