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30 साल पुराने सेवा विवाद में फंसे आईएएस अफसर, हाईकोर्ट ने अवमानना पर लगाया भारी जुर्माना

Apr 23, 2026 4:24 PM

हरियाणा। चंडीगढ़ स्थित पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने प्रशासनिक ढिलाई और न्यायिक आदेशों की अवमानना के एक मामले में सख्त नजीर पेश की है। जस्टिस सुदीप्ति शर्मा की पीठ ने हरियाणा कैडर के आईएएस अधिकारी मुकुल कुमार को आड़े हाथों लेते हुए उन पर एक लाख रुपये का हर्जाना लगाया है। अदालत ने इस बात पर गहरी आपत्ति जताई कि बार-बार अवसर दिए जाने के बावजूद अधिकारी ने न तो अनुपालना रिपोर्ट पेश की और न ही हलफनामा दायर किया। कोर्ट ने कड़ा निर्देश दिया है कि यह जुर्माना राशि आईएएस अधिकारी के वेतन से सीधे काटी जाए।

30 साल पुराना विवाद: क्या था मामला?

यह पूरा कानूनी मामला 'हैफेड' (HAFED) के एक पूर्व कर्मचारी बीबी गुप्ता की सेवा शर्तों से जुड़ा है। विवाद की जड़ साल 1994 में दिए गए एक इस्तीफे में छिपी है। याचिकाकर्ता के अनुसार, उन्होंने अपना इस्तीफा दिया था लेकिन बाद में उसे स्वीकार होने से पहले ही वापस ले लिया। बावजूद इसके, विभाग के सक्षम प्राधिकारी ने करीब तीन दशक पहले उनके इस्तीफे को 'बैक डेट' (पूर्व प्रभाव) से स्वीकार कर लिया, जिसे हाईकोर्ट ने पूरी तरह अवैध करार दिया है।

"पूर्व प्रभाव से इस्तीफा स्वीकार करना कानूनन गलत"

अदालत ने अपने फैसले में एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को दोहराया। कोर्ट ने कहा कि जब तक नियोक्ता द्वारा इस्तीफा औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं कर लिया जाता, तब तक कर्मचारी और विभाग के बीच का संबंध खत्म नहीं होता। जस्टिस शर्मा ने स्पष्ट किया कि सेवा नियमों में 'पिछली तारीख' से इस्तीफा मंजूर करने का कोई प्रावधान नहीं है। इसी आधार पर कोर्ट ने विभाग के पुराने आदेश को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता को सेवा में बहाल मानने और उन्हें 50 प्रतिशत बकाया वेतन देने का आदेश दिया था।

रडार पर प्रशासनिक सुस्ती, 25 मई को अगली सुनवाई

हाईकोर्ट ने पूर्व में ही चेतावनी दी थी कि यदि अगली सुनवाई तक हलफनामा पेश नहीं हुआ तो जुर्माना लगाया जाएगा। आदेश की तामील न होने पर कोर्ट ने अब यह दंडात्मक कार्रवाई की है। जुर्माने की 50 हजार रुपये की राशि 'हाईकोर्ट बार एसोसिएशन' और शेष 50 हजार रुपये 'हाईकोर्ट कर्मचारी कल्याण कोष' में जमा कराने के निर्देश दिए गए हैं। अब इस मामले की अगली सुनवाई 25 मई को होगी, जहां अधिकारी को अपनी सफाई और अनुपालना रिपोर्ट के साथ उपस्थित होना होगा। इस फैसले ने प्रशासनिक हलकों में यह संदेश साफ कर दिया है कि न्यायिक आदेशों में देरी अब अधिकारियों की जेब पर भारी पड़ेगी।

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