कैथल के बुजुर्ग का कमाल: 82 की उम्र में 10 घंटे उकडू बैठे रहे लक्ष्मण सिंह, युवाओं के छूटे पसीने
Apr 01, 2026 4:29 PM
कैथल। लांबा खेड़ी गांव के खेल मैदान में नजारा किसी दंगल जैसा था, लेकिन पहलवान खड़े नहीं बल्कि सफेद चूने से बने घेरों के अंदर उकडू बैठे थे। नियम सीधा था—जो बिना सहारा लिए सबसे लंबे समय तक इस मुद्रा में बैठा रहेगा, वही विजेता होगा। शाम को जब सूरज ढलना शुरू हुआ, तब गांव के 48 उत्साहियों ने इस चुनौती को स्वीकार किया। जैसे-जैसे घड़ी की सुइयां आगे बढ़ीं, एक-एक कर प्रतिभागी उठने लगे। किसी के पैरों में जकड़न हुई तो किसी का धैर्य जवाब दे गया। लेकिन जब रात के सवा दो बजे, तो मैदान में सिर्फ 6 'योद्धा' बचे थे, जिनमें सबसे उम्रदराज 82 साल के लक्ष्मण सिंह थे।
लक्ष्मण सिंह का जज्बा: "यह खेल नहीं, हमारी जीवनशैली है"
प्रतियोगिता के बाद चेहरे पर बिना किसी थकान के लक्ष्मण सिंह ने बताया कि पुराने समय में उकडू बैठना कोई करतब नहीं बल्कि दिनचर्या का हिस्सा था। उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा, "खेतों में काम करना हो या चौपाल पर ताश की बाजी, हम घंटों इसी मुद्रा में बिताते थे। आज की पीढ़ी कुर्सियों और सोफों की आदी हो गई है, जिससे शरीर की लचक खत्म हो गई।" लक्ष्मण सिंह के साथ बलकार, सुभाष, कोका, सुरेंद्र और जगदीश भी संयुक्त रूप से विजेता घोषित किए गए। ग्रामीणों ने उनके इस फौलादी जज्बे को देखते हुए चंदा इकट्ठा कर ईनाम की राशि 1100 से बढ़ाकर 8700 रुपये कर दी।
सरपंच की पहल: मोबाइल के 'जंजाल' से योग की 'मुद्रा' तक
गांव के सरपंच सोनू ने इस अनूठे आयोजन के पीछे की सोच साझा की। उन्होंने कहा, "आज का युवा मोबाइल फोन में डूबा रहता है। हमने सोचा कि क्यों न उन्हें अपनी प्राचीन योग पद्धति और पारंपरिक रहन-सहन की ताकत का अहसास कराया जाए। उकडू बैठना पाचन और जोड़ों के स्वास्थ्य के लिए रामबाण है।" सरपंच के अनुसार, इस प्रतियोगिता का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता फैलाना था। उन्होंने वादा किया कि भविष्य में भी ऐसी प्रतियोगिताएं होती रहेंगी ताकि विलुप्त होती परंपराओं को सहेजा जा सके।
योग और स्वास्थ्य का संगम
चिकित्सकों और योग विशेषज्ञों ने भी इस प्रतियोगिता की सराहना की है। उकडू बैठना (Malasana) शरीर के निचले हिस्से को मजबूती प्रदान करता है और रीढ़ की हड्डी के लिए बेहद फायदेमंद है। लांबा खेड़ी गांव के इस प्रयोग ने साबित कर दिया है कि तंदुरुस्ती के लिए महंगे जिम या उपकरणों की नहीं, बल्कि अपनी जड़ों की ओर लौटने की जरूरत है। पूरे कैथल जिले में इस 'उकडू दंगल' की चर्चा जोरों पर है।