हरियाणा वन विभाग का बड़ा खेल: सीएम के आदेश पर सस्पेंड रेंज ऑफिसर वीरेंद्र सिंह गुपचुप बहाल, जींद में मिली पोस्टिंग
Jun 16, 2026 5:00 PM
कुरुक्षेत्र। यह पूरा प्रशासनिक ड्रामा इस बात का गवाह है कि कैसे फील्ड में जनता के सामने लिए गए कड़े फैसले चंडीगढ़ के वातानुकूलित दफ्तरों में पहुंचते-पहुंचते दम तोड़ देते हैं। मामला इस साल 4 फरवरी को कुरुक्षेत्र के लाडवा में आयोजित मुख्यमंत्री के जनसंवाद शिविर से जुड़ा है। देश की सीमाओं की रक्षा कर चुके और वर्तमान में वनरक्षक के पद पर तैनात पूर्व सैनिक गुरमीत सिंह ने हिम्मत दिखाते हुए मुख्यमंत्री के सामने एक लिखित शिकायत रखी थी। शिकायत में सीधे तौर पर पिहोवा के तत्कालीन रेंज ऑफिसर वीरेंद्र सिंह पर सरकारी खजाने को चूना लगाने के लिए फर्जी बिल तैयार करने और उन पर जबरन दस्तखत करवाने के गंभीर आरोप थे।
गुरमीत सिंह का कहना था कि जब उन्होंने एक सच्चे सैनिक की तरह इस गलत काम का हिस्सा बनने से मना कर दिया, तो रेंज ऑफिसर ने पद का धौंस दिखाते हुए उन्हें नौकरी से हटवाने की धमकियां दीं और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया। एक पूर्व सैनिक की जुबानी भ्रष्टाचार की यह कहानी सुन मुख्यमंत्री ने तुरंत कड़ा रुख अख्तियार किया था। उन्होंने मंच से ही रेंज ऑफिसर वीरेंद्र सिंह को सस्पेंड करने और पूरे मामले की विजिलेंस या उच्च स्तरीय कमेटी से गहन जांच कराने के सख्त निर्देश दिए थे। उस वक्त लगा था कि रसूखदारों पर गाज गिरेगी, लेकिन अंदरखाने स्क्रिप्ट कुछ और ही लिखी जा रही थी।
तीन महीने में 'दाग' साफ: किस बड़े अफसर की मेहरबानी से बची कुर्सी?
मुख्यमंत्री के आदेश के बाद ऐसा माहौल बना कि विभाग में बड़ी सफाई होगी, लेकिन वन विभाग के भीतर बैठे कुछ रसूखदार और चहेते अफसरों को बचाने वाले 'सिंडिकेट' ने अपना जाल बुनना शुरू कर दिया। नतीजतन, मुख्यमंत्री के आदेशों को रद्दी की टोकरी में डालते हुए गत 15 मई को वीरेंद्र सिंह की बहाली के आदेश गुपचुप तरीके से जारी कर दिए गए। चौंकाने वाली बात यह है कि इस गंभीर वित्तीय घोटाले की अंतिम जांच रिपोर्ट अभी तक टेबल पर ही घूम रही है और उस पर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
विभागीय सूत्रों की मानें तो वीरेंद्र सिंह वन विभाग के कुछ शीर्ष अधिकारियों की 'गुड बुक्स' में शामिल हैं। यही वजह है कि बिना किसी कानूनी औपचारिकता या जांच के पूरे मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया और उन्हें क्लीन चिट जैसी राहत दे दी गई। इतना ही नहीं, उनकी बहाली को विवादों से दूर रखने के लिए पिहोवा से हटाकर जींद में नई तैनाती दे दी गई, ताकि मामला मीडिया की नजरों में न आए।
'जीरो टॉलरेंस' के दावों के बीच सुलगते सवाल
यह घटनाक्रम सिर्फ एक अधिकारी की बहाली का नहीं है, बल्कि यह उस पूरी व्यवस्था पर चोट है जो पारदर्शी शासन का दम भरती है। इस बहाली ने वन विभाग के भीतर काम करने वाले ईमानदार कर्मचारियों के मनोबल को बुरी तरह तोड़ दिया है। अब सचिवालय से लेकर फील्ड तक यह सवाल गूंज रहा है कि क्या वन विभाग में बैठे कुछ आला अफसर सूबे के मुख्यमंत्री से भी ऊपर हो गए हैं? क्या जनसंवाद जैसे मंच सिर्फ जनता को संतुष्ट करने के लिए हैं, जहां लिए गए फैसलों की उम्र महज तीन महीने होती है?
फिलहाल, इस गुपचुप बहाली के बाद वन विभाग के निचले स्टाफ और आम जनता में गहरा रोष है। अब हर किसी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) अपने ही आदेशों की इस खुली अवहेलना और फाइलों के इस खेल पर संज्ञान लेकर कोई बड़ी कार्रवाई करेगा, या फिर यह घोटाला भी फाइलों के अंबार में हमेशा के लिए दफन हो जाएगा।