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Kurukshetra News: कुरुक्षेत्र के आयुष विश्वविद्यालय में पंचकर्म का कमाल, व्हीलचेयर पर आया मरीज पैरों पर चलकर लौटा घर

Jun 16, 2026 4:44 PM

कुरुक्षेत्र। कहते हैं जहां आधुनिक चिकित्सा पद्धतियां और भारी-भरकम दवाएं घुटने टेक देती हैं, वहां भारत की प्राचीन आयुर्वेद प्रणाली उम्मीद की एक नई किरण बनकर सामने आती है। ऐसा ही एक न्यूरोलॉजिकल 'चमत्कार' कुरुक्षेत्र स्थित श्रीकृष्ण आयुष विश्वविद्यालय के आयुर्वेदिक अस्पताल में देखने को मिला है। गंभीर नर्व कंप्रेशन के कारण लगभग अपाहिज हो चुके अंबाला जिले के गांव खोजकीपुर निवासी 62 वर्षीय सतपाल अब अपने पैरों पर खड़े होकर सामान्य जिंदगी की तरफ लौट रहे हैं। एक समय ऐसा था जब अपनी बेबसी पर आंसू बहाने वाले सतपाल को उनके परिजन व्हीलचेयर पर घसीटने को मजबूर थे, लेकिन आज वे बिना किसी सहारे के चलते-फिरते नजर आ रहे हैं।

जब पैरों ने साथ छोड़ा और जिंदगी बन गई नर्क

अपनी आपबीती साझा करते हुए सतपाल भावुक हो उठते हैं। उन्होंने बताया कि करीब डेढ़ साल पहले पीठ और कमर में एक धीमा दर्द शुरू हुआ था, जिसे उन्होंने शुरुआती दिनों में मामूली समझकर नजरअंदाज कर दिया। लेकिन धीरे-धीरे इस दर्द ने विकराल रूप ले लिया और दाईं टांग को पूरी तरह अपनी चपेट में ले लिया। हालात इस कदर बदतर हो गए कि पैरों में इतनी ताकत भी नहीं बची थी कि वे चप्पल तक पहन सकें। बिस्तर से उठना मुहाल था और पत्नी व बेटे के सहारे के बिना एक इंच हिलना भी उनके लिए मुमकिन नहीं रह गया था। कई बड़े अस्पतालों के चक्कर काटने के बाद भी जब कोई आराम नहीं मिला, तो हारकर परिजनों ने 2 अप्रैल को उन्हें व्हीलचेयर पर बिठाया और अंतिम उम्मीद के साथ आयुष विश्वविद्यालय के पंचकर्म विभाग के प्रोफेसर डॉ. राजा सिंगला की शरण में ले आए।

नसों और मांसपेशियों का टूट चुका था तालमेल

अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक प्रो. डॉ. राजा सिंगला ने मरीज की स्थिति की तकनीकी गंभीरता को समझाते हुए बताया कि सतपाल की हालत बेहद चिंताजनक थी। जांच में सामने आया कि उनके शरीर में नसों और मांसपेशियों के बीच का आपसी तालमेल (कोऑर्डिनेशन) पूरी तरह खत्म हो चुका था। मेडिकल रिपोर्ट के मुताबिक, रीढ़ की हड्डी में D-7 से D-11 स्तर तक डिस्क प्रोट्रूजन (डिस्क का खिसकना) था और L-3 से L-5 स्तर तक नर्व कंप्रेशन यानी नसें बेहद बुरी तरह दबी हुई थीं। यही वजह थी कि उनके कमर के नीचे के हिस्से में खून का दौरा और संवेदनाएं खत्म हो रही थीं, जिससे दोनों पैर सुन्न और बेजान हो चुके थे।

दो चरणों की थेरेपी ने पलट दी किस्मत: खत्म हुआ सुन्नपन

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. वैद्य करतार सिंह धीमान और कुलसचिव डॉ. कृष्ण कांत गुप्ता के दिशा-निर्देशन में सतपाल का इलाज शुरू किया गया। डॉ. राजा सिंगला की देखरेख में उन्हें पहले चरण में 28 दिनों के लिए अस्पताल में भर्ती किया गया। इस दौरान बिना किसी हैवी पेनकिलर के, विशुद्ध आयुर्वेदिक औषधियों के साथ 'तेल धारा', 'कटि बस्ती' और 'मात्रा बस्ति' जैसी जटिल पंचकर्म प्रक्रियाओं से उनका उपचार किया गया। चमत्कारिक रूप से महज 10 दिनों के भीतर सतपाल के पैरों में हरकत शुरू हो गई। एक महीने के अंतराल के बाद, 1 जून को उन्हें थेरेपी के दूसरे चरण के लिए दोबारा भर्ती किया गया।

इस समय सतपाल खुद को 70 प्रतिशत से ज्यादा स्वस्थ और ऊर्जावान महसूस कर रहे हैं। उनके पैरों का पुराना सुन्नपन और जकड़न पूरी तरह गायब हो चुकी है। अपनी खोई हुई स्फूर्ति और आत्मनिर्भरता वापस पाकर सतपाल ने भावुक मन से आयुष विश्वविद्यालय के डॉक्टरों और पूरी मेडिकल टीम का धन्यवाद किया है। गौरतलब है कि इस अस्पताल के कमरा नंबर-29 में हर सोमवार और गुरुवार को ओपीडी लगती है, जहां ऑटोइम्यून और न्यूरोमस्कुलर जैसी जटिल बीमारियों का आयुर्वेद से सफल इलाज किया जा रहा है।

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