2.13 करोड़ खर्च, फिर भी शौचालय बंद: भीष्म कुंड में श्रद्धालु परेशान, नशेड़ियों का बना अड्डा
Jun 08, 2026 12:49 PM
ज्योतिसर। (पवन शर्मा) महाभारत के उस अमर अध्याय को समेटे भीष्म कुंड (बाण गंगा) की दुर्दशा आज प्रशासनिक अनदेखी की जीती-जागती मिसाल बन चुकी है, जहां पितामह भीष्म ने बाणों की शैया पर लेटकर जल की इच्छा जताई थी और अर्जुन ने गांडीव से धरती की छाती चीरकर जलधारा निकाली थी। देश-विदेश के लाखों श्रद्धालुओं के लिए अगाध श्रद्धा का केंद्र बन चुके इस पावन स्थल पर सरकार ने कागजों में तो करोड़ों रुपये बहा दिए, लेकिन धरातल पर कड़वा सच यह है कि यहां आने वाले तीर्थयात्रियों को शौचालय जैसी अति-आवश्यक सुविधा के लिए भी दर-दर भटकना पड़ रहा है।
योजना के नाम पर हुआ भारी-भरकम खर्च, लेकिन जनता को मिला सिर्फ ताला
दरअसल, कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड (KDB) की देखरेख में कृष्णा सर्किट योजना के तहत भीष्म कुंड परिसर का कायाकल्प और सौंदर्यीकरण किया गया था। परिसर की मुख्य दीवार पर टंगे सूचना बोर्ड को देखें तो इस पूरे प्रोजेक्ट पर ₹2,12,96,000 की भारी-भरकम राशि खर्च दिखाई गई है। इसी मोटी रकम के एक हिस्से से श्रद्धालुओं, विशेषकर महिलाओं और बुजुर्गों की सहूलियत के लिए आधुनिक कमोड और शौचालयों का निर्माण भी कराया गया था। स्थानीय ग्रामीणों और दुकानदारों की मानें तो यह सरकारी भवन बनने के बाद से आज तक आम जनता के लिए कभी खोला ही नहीं गया। इस पर हमेशा ताला लटका रहा।
रखवाली नहीं हुई तो चोरों ने साफ किया हाथ, अब नशेड़ियों की शरणस्थली बना परिसर
करोड़ों के बजट से तैयार इस सरकारी संपत्ति की सुरक्षा को लेकर प्रशासन कितना गंभीर है, इसका अंदाजा भीष्म कुंड परिसर के भीतर जाकर आसानी से लग जाता है। लंबे समय तक बंद रहने और किसी भी चौकीदार की तैनाती न होने के कारण चोरों ने इस भवन की खिड़कियां, दरवाजे, पानी के नल और महंगी सैनिटरी फिटिंग तक उखाड़ ली। अब यह वीरान और खंडहर नुमा भवन दिन ढलते ही असामाजिक तत्वों और स्मैकियों का सुरक्षित ठिकाना बन जाता है, जिससे यहां शाम के वक्त आने वाले परिवारों की सुरक्षा पर भी बड़ा खतरा मंडराने लगा है।
दूर-दराज से आए श्रद्धालुओं का फूटा गुस्सा, खड़े किए तीखे सवाल
पंजाब के गुरदासपुर से अपने परिवार के साथ भीष्म कुंड के दर्शन करने पहुंचे श्रद्धालु अंगद शर्मा ने व्यवस्था पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया। उन्होंने कहा, "कुरुक्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चमकाने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इतने बड़े ऐतिहासिक तीर्थ पर महिलाओं के लिए एक अदद साफ शौचालय तक नहीं है।" स्थानीय लोगों का भी यही कहना है कि जब आम राहगीर और श्रद्धालु को बुनियादी सुविधाएं ही नहीं मिल पा रही हैं, तो फिर दो करोड़ से अधिक की इस राशि का इस्तेमाल आखिर किसके फायदे के लिए किया गया? ग्रामीणों ने कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड और जिला प्रशासन से इस बंद पड़े परिसर की तत्काल मरम्मत कराने और इसे नियमित रूप से चालू रखने की पुरजोर मांग की है।