Search

सुगनी देवी आर्य स्कूल में जेंडर सेंसिटिविटी पर वर्कशॉप, शिक्षकों को दी गई पॉक्सो और पोश एक्ट की ट्रेनिंग

May 27, 2026 1:20 PM

लाडवा (कैलाश गोयल) आज के दौर में शिक्षा का मतलब सिर्फ किताबी ज्ञान देना नहीं, बल्कि बच्चों को एक संवेदनशील और जागरूक नागरिक बनाना भी है। इसी दिशा में कदम बढ़ाते हुए लाडवा के सुगनी देवी आर्य गर्ल्स सीनियर सेकेंडरी स्कूल में दो दिवसीय 'जेंडर सेंसिटिव' कार्यशाला का आयोजन किया गया। 26 व 27 मई को चले इस विशेष इन-हाउस सीबीपी प्रशिक्षण की मुख्य वक्ता और रिसोर्स पर्सन स्कूल की प्रधानाचार्या पूजा छाबड़ा रहीं। प्रार्थना गीत के साथ शुरू हुई इस कार्यशाला में स्कूल के सभी महिला व पुरुष शिक्षकों ने हिस्सा लिया और समझा कि कैसे अनजाने में हमारी बातें बच्चों के मानस पटल पर जेंडर की गलत छवि बना देती हैं।

हमारे उदाहरण और भाषा भी पैदा करते हैं जेंडर बायस

कार्यशाला के पहले सत्र में प्रधानाचार्या पूजा छाबड़ा ने उन बारीकियों पर ध्यान खींचा जो आमतौर पर नजरअंदाज कर दी जाती हैं। उन्होंने केस स्टडी और रोल-प्ले (अभिनय) के जरिए शिक्षकों को समझाया कि कई बार कक्षाओं में दिए जाने वाले उदाहरण या इस्तेमाल की जाने वाली भाषा भी लड़के और लड़कियों के बीच जेंडर स्टीरियोटाइप (रूढ़िवादिता) को बढ़ावा देती है। अध्यापकों को सलाह दी गई कि वे ऐसी भाषा और उदाहरणों से बचें जो किसी एक जेंडर की तरफ झुके हुए हों। कक्षा का माहौल ऐसा होना चाहिए जहां लड़का हो या लड़की, दोनों खुद को मानसिक रूप से समान महसूस कर सकें।

पोश, पॉक्सो और पावर रिलेशन पर गहन चर्चा

ट्रेनिंग के दूसरे दिन का एजेंडा काफी संवेदनशील और कानूनी पहलुओं से जुड़ा रहा। इस दौरान पोश (POSH) अधिनियम, पॉक्सो (POCSO) एक्ट के साथ-साथ समाज में मौजूद 'पावर रिलेशन' (सत्ता समीकरण) और जेंडर आधारित हिंसा के विभिन्न रूपों पर विस्तार से बात की गई। प्रधानाचार्या ने बताया कि समाज और परिवारों में शक्ति का असंतुलन किस तरह से घरेलू हिंसा, धमकियों, आर्थिक और मानसिक उत्पीड़न को जन्म देता है। शिक्षकों को विशेष टिप्स दिए गए कि वे स्कूल स्तर पर बच्चों के व्यवहार को देखकर ऐसी किसी भी प्रताड़ना या असामान्य घटना को कैसे पहचानें और पीड़ित बच्चे की सही मदद कैसे करें।

शिक्षक ही समाज में ला सकते हैं असली बदलाव

कार्यशाला के समापन सत्र को संबोधित करते हुए प्रधानाचार्या पूजा छाबड़ा ने कहा कि कोई भी सामाजिक बदलाव बिना शिक्षकों के मुमकिन नहीं है, क्योंकि वे ही समाज की पहली कड़ी हैं। स्कूल में मिलने वाले संस्कार और माहौल से ही बच्चे का भविष्य तय होता है। कार्यशाला में शामिल सभी शिक्षक-शिक्षिकाओं ने इस दो दिवसीय सत्र को बेहद उपयोगी और आंखें खोलने वाला बताया। शिक्षकों ने संकल्प लिया कि वे इस ट्रेनिंग में सीखी गई बातों को अपनी रोजमर्रा की क्लास और टीचिंग स्टाइल में जरूर लागू करेंगे, ताकि स्कूल में हर विद्यार्थी सुरक्षित महसूस करे।

You may also like:

Please Login to comment in the post!