भागवत कथा के 13वें दिन उमड़ा श्रद्धा का सैलाब, भक्ति रस में डूबा पिहोवा का गोबिदानंद आश्रम
May 30, 2026 1:38 PM
पिहोवा, (अभिषेक पूर्णिमा): आध्यात्मिक नगरी पिहोवा के स्थानीय श्री गोबिदानंद आश्रम में इन दिनों भक्ति की अविरल धारा बह रही है। आश्रम में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के १३वें दिन आज श्रद्धालुओं का भारी सैलाब उमड़ा। इस अवसर पर व्यासपीठ को सुशोभित कर रहीं प्रख्यात कथा वाचक महंत सर्वेश्वरी गिरी ने कई पौराणिक और आध्यात्मिक प्रसंगों का ऐसा सजीव और भावपूर्ण वर्णन किया कि पूरा परिसर 'हरे कृष्ण' और 'जय श्री राम' के जयकारों से गुंजायमान हो उठा। उन्होंने अपनी अमृतवाणी से श्रद्धालुओं को न केवल कथा का रसपान कराया, बल्कि धर्म, भक्ति, त्याग और लोककल्याण के गूढ़ रहस्यों से भी अवगत कराया।
भगीरथ के तप से हुआ गंगा अवतरण, श्रीराम का चरित्र ही सच्चा मार्गदर्शक
महंत सर्वेश्वरी गिरी ने कथा के प्रवाह को आगे बढ़ाते हुए राजा सगर की कथा और सूर्यवंश के प्रतापी राजा भगीरथ के कठोर तप से मां गंगा के पृथ्वी पर अवतरण का प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि यह कथा भारतीय संस्कृति में तप, अटूट प्रयास और सत्यनिष्ठा की सबसे बड़ी मिसाल है। भगीरथ के इसी आत्मत्याग के कारण आज पतित पावनी गंगा धरातल पर मौजूद हैं, जिससे असंख्य जीवों का उद्धार हो रहा है।
इसके बाद उन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के दिव्य जीवन चरित्र पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि श्रीराम का जीवन एक आदर्श पुत्र, निष्ठावान भाई, समर्पित पति और एक न्यायप्रिय राजा के रूप में संपूर्ण मानव जाति के लिए सबसे बड़ा प्रेरणास्रोत है। रामायण के प्रसंगों का हवाला देते हुए उन्होंने समझाया कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विषम क्यों न हों, मनुष्य को कभी भी अपने धर्म और सत्य का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए।
समुद्र मंथन के छिपे संदेश और राजा बलि के असीम दान की गाथा
कथा के अगले चरण में चंद्रवंश की गौरवगाथा और समुद्र मंथन के रहस्यों को उजागर किया गया। महंत ने मंथन से निकले १४ रत्नों का आध्यात्मिक महत्व बताते हुए कहा कि यह प्रसंग असल में हमारे भीतर चलने वाली सकारात्मक और नकारात्मक शक्तियों के संतुलन का संदेश देता है।
वहीं, राजा बलि और भगवान विष्णु के वामन अवतार की कथा ने पंडाल में बैठे श्रद्धालुओं को गहराई तक झकझोर दिया। उन्होंने बताया कि राजा बलि दानशीलता, अपनी वचनबद्धता और संपूर्ण समर्पण के अद्वितीय प्रतीक थे। जब भगवान विष्णु ने वामन रूप में आकर उनसे तीन पग भूमि मांगी और अपने विराट स्वरूप से पूरी सृष्टि को नाप लिया, तब बलि ने अपना शीश आगे कर दिया। कथा व्यास ने जोर देकर कहा कि इस प्रसंग से हमें यह सीख मिलती है कि ईश्वर के सामने सांसारिक धन-दौलत, वैभव और इंसान के अहंकार की कोई हैसियत नहीं है।
केवल सुनने तक सीमित न रहे कथा, आचरण में लाना जरूरी
व्यासपीठ से श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए महंत सर्वेश्वरी गिरी ने एक बेहद मार्मिक अपील की। उन्होंने कहा कि इन दिव्य और पौराणिक प्रसंगों को केवल कानों से सुनकर भूल जाना इसकी सार्थकता नहीं है। मानव जीवन तभी सफल हो सकता है जब हम इन कथाओं से सीख लेकर सेवा, करुणा, परोपकार और सत्य को अपने रोजमर्रा के आचरण में ढालें। कथा के विश्राम पर मुख्य यजमानों द्वारा भागवत जी की महाआरती उतारी गई, जिसके बाद उपस्थित सैकड़ों श्रद्धालुओं के बीच खीर और फल का प्रसाद वितरित किया गया।