वर्ल्ड बाइसिकल डे विशेष: 71 की उम्र में भी न शुगर, न बीपी और न थकान, साइकिल के पैडल से दूर रही बीमारियां
Jun 02, 2026 5:17 PM
कुरुक्षेत्र (सतविंद्र सिंह)। भागदौड़ भरी आधुनिक जीवनशैली में जहां 30-40 की उम्र पार करते ही लोग बीपी, शुगर और जोड़ों के दर्द की दवाइयां जेब में लेकर घूमने लगते हैं, वहीं धर्मनगरी कुरुक्षेत्र से सेहत की एक ऐसी कहानी सामने आई है जो किसी को भी हैरत में डाल सकती है। पुलिस महकमे से करीब 12 साल पहले सब-इंस्पेक्टर के पद से सेवानिवृत्त हुए कर्म चंद आज 71 साल के हो चुके हैं, लेकिन उनकी फिटनेस किसी 25 साल के गबरू जवान को भी पानी पिला सकती है। विश्व साइकिल दिवस (World Bicycle Day) के मौके पर जब जगमार्ग की टीम ने उनसे बात की, तो सेहत का एक ऐसा अनमोल नुस्खा सामने आया जिसे आज की पीढ़ी पूरी तरह बिसरा चुकी है। कर्म चंद पिछले 63 सालों से लगातार साइकिल चला रहे हैं और इसी का नतीजा है कि आज बुढ़ापा भी उनके पास फटकने से कतराता है।
सहकर्मी उड़ाते थे मजाक, कहते थे—'मोटरसाइकिल तो ले लो थानेदार साहब!'
कर्म चंद अपने अतीत के पन्नों को पलटते हुए बताते हैं कि उनका पैतृक गांव करनाल के निसिंग के पास 'अथनाला' है। बचपन के दिनों में उनका स्कूल गांव से पांच किलोमीटर दूर जुंडला कस्बे में था, जहां जाने का एकमात्र सहारा साइकिल ही थी। यहां तक कि गांव से 15 किलोमीटर दूर करनाल शहर से घर का राशन या गैस सिलेंडर लाना हो, तो घरवाले कर्म चंद और उनकी साइकिल पर ही भरोसा जताते थे। बाद में जब वे पुलिस विभाग में भर्ती हुए, तो घर में दोपहिया वाहन होने के बावजूद उन्होंने ड्यूटी पर जाने के लिए कभी साइकिल का साथ नहीं छोड़ा। थाना परिसर या वीआईपी ड्यूटी के दौरान जब वे खाकी वर्दी में साइकिल से पहुंचते, तो उनके साथी अक्सर चुटकी लेते हुए कहते थे—"थानेदार साहब, कम से कम एक मोटरसाइकिल तो खरीद लो, साइकिल पर चलते अच्छे नहीं लगते।" मगर कर्म चंद ने लोकलाज और मजाक की परवाह किए बिना अपनी पैडलिंग जारी रखी।
ताना मारने वाले खा रहे हैं दवाइयां, कर्म चंद को कभी बुखार तक नहीं आया
वक्त का पहिया घूमा और आज कर्म चंद उन सभी तंज कसने वालों के लिए एक सबक बन चुके हैं। वे बताते हैं, "आज जो लोग मेरी साइकिल देखकर हंसते थे, उनमें से अधिकांश कोई न कोई गंभीर शारीरिक व्याधि झेल रहे हैं और सुबह-शाम गोलियां फांक रहे हैं। दूसरी तरफ, मुझे बीपी-शूगर तो बहुत दूर की बात है, याद नहीं आता कि आखिरी बार मामूली बुखार कब हुआ था।" कर्म चंद के मुताबिक, साइकिल की सवारी केवल जेब के पैसे ही नहीं बचाती, बल्कि यह आपके फेफड़ों, दिल और मांसपेशियों को वो प्राकृतिक व्यायाम देती है जो जिम की महंगी मशीनें भी नहीं दे सकतीं। इसके साथ ही यह बिना एक बूंद धुआं उड़ाए पर्यावरण संरक्षण में जो योगदान देती है, उसकी कीमत अमूल्य है।
"मंदिर जाने के लिए भी कार निकालते हैं लोग"—लोकल कामों के लिए साइकिल इस्तेमाल करने की नसीहत
आजकल कुरुक्षेत्र के सेक्टर-5 में सपरिवार रह रहे कर्म चंद समाज के बदलते ढर्रे और आरामपरस्ती को लेकर थोड़े चिंतित भी नजर आते हैं। वे कहते हैं कि आज लोग घर के ठीक बाहर मंदिर जाने या नुक्कड़ की दुकान से दूध की थैली लाने के लिए भी बड़ी-बड़ी गाड़ियां निकाल लेते हैं। जितने समय में लोग तंग गलियों में कार को बैक और टर्न करते हैं, उतने समय में तो पैदल या साइकिल से काम निपटाकर वापस आया जा सकता है। इसी सोच को बदलने के लिए कर्म चंद अब 'प्रेरणा समिति हरियाणा' नाम की संस्था से जुड़कर जन-जन तक पर्यावरण की शुद्धता और साइकिल संस्कृति को पुनर्जीवित करने का अलख जगा रहे हैं। उनका संदेश साफ है—अगर लंबी और निरोगी जिंदगी जीनी है, तो कम से कम स्थानीय और छोटे कामों के लिए गाड़ियों की चाबी छोड़िए और साइकिल का पैडल मारना शुरू कीजिए।