काशी की भस्म होली: मणिकर्णिका घाट पर खेली गई पारंपरिक मसाने की होली, 3 लाख टूरिस्ट पहुंचे
Feb 28, 2026 5:27 PM
वाराणसी: वाराणसी में शनिवार को रंगभरी एकादशी के दूसरे दिन मणिकर्णिका घाट पर पारंपरिक मसाने की होली खेली गई। धधकती चिताओं, शोक में डूबे परिजनों और चिता भस्म के बीच नागा साधु-संन्यासी एकत्र हुए और डमरू वादन के साथ उत्सव की शुरुआत की। साधुओं ने पहले घाट पर पूजन किया और बाबा मसान नाथ को भस्म, रंग, गुलाल और अबीर अर्पित किए। इसके बाद चिता की राख से होली खेली गई। घाट से शवयात्राएं लगातार गुजरती रहीं, जबकि श्रद्धालु आस्था के साथ इस अनूठी परंपरा में शामिल हुए।
डमरू वादन से शुरू हुआ रंगोत्सव
शनिवार को मसाने की होली का रंगोत्सव डमरू की गूंज से आरंभ हुआ। साधु-संन्यासी मणिकर्णिका घाट पहुंचे और विधि-विधान से पूजन संपन्न किया। कई संन्यासी गले में नरमुंडों की माला और चश्मा लगाए दिखाई दिए, तो कुछ डमरू की थाप पर नाचते नजर आए। घाट पर रंग और भस्म का मिश्रण वातावरण में फैल गया। विदेशी पर्यटक भी इस दृश्य को देखने पहुंचे और रंग व राख में सराबोर होकर उत्सव का हिस्सा बने।
आस्था और परंपरा का संगम
मान्यता है कि रंगभरी एकादशी के बाद भगवान शिव अपने गणों के साथ श्मशान में होली खेलने आते हैं। इसी विश्वास के साथ महाश्मशान मंदिर की ओर से यह परंपरा निभाई जाती है। मंदिर के व्यवस्थापक गुलशन कपूर ने कहा कि बनारस मस्ती और मजे का शहर है, जहां हर व्यक्ति अपने रंग में रंगा रहता है। उनके अनुसार, यहां की होली रंग-गुलाल की नहीं बल्कि चिता भस्म की होती है, जो इसे विशिष्ट बनाती है।
प्रशासन की सीमित अनुमति और भीड़
इस वर्ष काशी विद्वत परिषद ने मसाने की होली को लेकर आपत्ति जताई थी। इसके बाद प्रशासन ने सीमित संख्या में लोगों को ही घाट तक जाने की अनुमति दी। कई श्रद्धालु और पर्यटक रास्ता बंद होने के कारण गलियों में ही रुक गए। बावजूद इसके, मसाने की होली खेलने के लिए करीब तीन लाख से अधिक लोग काशी पहुंचे। घाट पर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रही और नियंत्रित संख्या में ही लोगों को प्रवेश दिया गया।
देश-विदेश से पहुंचे श्रद्धालु
कामाख्या से आई तंत्र साधक श्री गीतम ने बताया कि श्मशान की होली खेलकर वह स्वयं को धन्य महसूस कर रही हैं। उनके अनुसार, काशी का श्मशान अपने आप में अद्भुत है और यहां की मिट्टी भी श्रद्धा से माथे पर लगाई जाती है। मध्य प्रदेश से आई एक युवती ने कहा कि भगवान भोलेनाथ के साथ यह पर्व मनाकर उन्हें विशेष आनंद की अनुभूति हुई। श्रद्धालुओं ने इसे आस्था, परंपरा और आध्यात्मिक विश्वास का संगम बताया।