कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के बीच चर्चा में आया जंतर-मंतर, जानिए राजा जयसिंह की इस जादुई वेधशाला का इतिहास
Jun 06, 2026 1:43 PM
राजधानी दिल्ली का दिल कहे जाने वाले कनॉट प्लेस की घुमावदार सफेद इमारतों और जनपथ मार्केट की हलचल से चंद कदम आगे बढ़ते ही संसद मार्ग पर लाल रंग की कुछ विशालकाय और अजीबोगरीब कलाकृतियां अपनी ओर ध्यान खींचती हैं। आज की तारीख में देश का कोई भी नागरिक जंतर-मंतर का नाम सुनता है, तो उसके जहन में तख्तियां लिए प्रदर्शन करते लोग, बैरिकेड्स और पुलिस की गाड़ियां तैर जाती हैं। आजकल तो सोशल मीडिया की नई सनसनी 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) और उसके कर्ता-धर्ता अभिजीत दीपके भी शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ हुंकार भरने यहीं डेरा डाले हुए हैं, जिसने इसे 'जेन-जी' (Gen-Z) का नया ट्रेंडिंग की-वर्ड बना दिया है।
मगर सियासत और नारों के इस शोर के पीछे ईंट-गारे से रची गई एक ऐसी जादुई वैज्ञानिक दुनिया है, जिसने सदियों पहले पूरी दुनिया के खगोलशास्त्रियों को दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर दिया था। यह कोई आधुनिक आर्ट गैलरी या महज कोई स्मारक नहीं, बल्कि भारत की वैज्ञानिक प्रगति का वो जीता-जागता दस्तावेज है जो हमारे समृद्ध इतिहास की गवाही देता है।
जब राजा जयसिंह ने सुधारीं मुगलों के कैलेंडरों की गलतियां
इस ऐतिहासिक वेधशाला के निर्माण की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। 18वीं शताब्दी की शुरुआत में जब देश पर मुगल बादशाह मोहम्मद शाह का शासन था, तब जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने महसूस किया कि उस दौर में इस्तेमाल होने वाले खगोलीय कैलेंडर और तालिकाएं काफी अशुद्ध हैं। ग्रहों, नक्षत्रों और समय की जो गणना की जा रही थी, उसमें बड़ी गलतियां सामने आ रही थीं। राजा जयसिंह सिर्फ एक कुशल योद्धा या रणनीतिकार ही नहीं थे, बल्कि गणित और खगोल विज्ञान (Astronomy) के प्रकांड पंडित भी थे।
कैलेंडर की इसी खामी को दुरुस्त करने के लिए उन्होंने देश में पांच जगहों— दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा में वेधशालाओं की नींव रखी। इनमें से दिल्ली का जंतर-मंतर साल 1724 में बना पहला और सबसे महत्वपूर्ण केंद्र था, जिसे आज भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा राष्ट्रीय स्मारक के रूप में सहेज कर रखा गया है।
'जंतर-मंतर' यानी गणना करने वाली मशीनें
अक्सर लोग इसे सिर्फ एक नाम की तरह लेते हैं, लेकिन इसका शाब्दिक अर्थ पूरी तरह वैज्ञानिक है। यह नाम संस्कृत के 'यंत्र' (उपकरण) और 'मंत्र' (गणना या विचार-विमर्श) का अपभ्रंश है। राजा जयसिंह जानते थे कि पीतल या अन्य धातुओं के छोटे उपकरण मौसम के बदलने, हवा के दबाव या वक्त के साथ अपनी सटीकता खो सकते हैं। इसलिए उन्होंने चूने और पत्थरों के ऐसे विशालकाय ढांचे खड़े करवाए, जिन पर मौसम का कोई असर न पड़े।
इस परिसर में मौजूद हर एक ढांचा अपने आप में एक सुपर कंप्यूटर की तरह काम करता था। उदाहरण के लिए:
सम्राट यंत्र: यह लगभग 70 फीट ऊंची एक विशाल धूपघड़ी (Sun Dial) है। सूरज की रोशनी और इससे ढलने वाली परछाई के जरिए यह आज भी स्थानीय समय को सेकंड के सबसे छोटे हिस्से तक बिल्कुल सटीक मापती है।
जय प्रकाश यंत्र: जमीन में धंसे दो कटोरानुमा (हेमिस्फेयर) गड्ढों वाला यह यंत्र रात और दिन, दोनों ही समय आसमान में किसी विशिष्ट तारे या ग्रह की सटीक अक्षांश स्थिति बताने में सक्षम था।
राम यंत्र: दो बेलनाकार खुली इमारतों वाला यह यंत्र ग्रहों की ऊंचाई और उनकी दिशा नापने के काम आता था।
मिश्र यंत्र: यह पांच अलग-अलग यंत्रों का एक अनूठा कोलाज है। इसकी सबसे हैरान करने वाली खूबी यह थी कि दिल्ली में बैठा ज्योतिषी इसके जरिए ज्यूरिख, समरकंद और नोटके जैसे दुनिया के सुदूर शहरों में दोपहर होने का सही समय जान लेता था।
विदेशी आक्रमणों, दिल्ली पर हुए हमलों और खासकर 1857 के गदर के दौरान इस ऐतिहासिक धरोहर को भारी नुकसान पहुंचाया गया। बाद में अंग्रेजी हुकूमत और आजादी के बाद भारत सरकार ने इसका जीर्णोद्धार कराया। आज भले ही समय को नापने के लिए हमारी कलाइयों पर आधुनिक घड़ियां और जेबों में स्मार्टफोन आ गए हों, लेकिन जंतर-मंतर की ये खामोश दीवारें आज भी चीख-चीखकर कहती हैं कि जब दुनिया समय देखना सीख रही थी, भारत ब्रह्मांड के रहस्य सुलझा रहा था।