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यमुनानगर में करोड़ों का बजट खा गईं स्ट्रीट लाइटें, नेशनल हाईवे से लेकर जिला जेल रोड तक पसरा अंधेरा

May 18, 2026 11:58 AM

यमुनानगर। यमुनानगर और जगाधरी को आपस में जोड़ने वाली लाइफलाइन कही जाने वाली सड़कों पर इन दिनों सरकार के दावों की हवा निकल रही है। करोड़ों रुपये के सरकारी बजट को ठिकाने लगाकर चमकाई गई स्ट्रीट लाइटें अब सफेद हाथी साबित हो रही हैं। जगाधरी-पांवटा साहिब नेशनल हाईवे हो या फिर जिला सचिवालय के ठीक सामने से गुजरने वाली मुख्य सड़क, सूरज ढलते ही यहां घुप अंधेरा छा जाता है। हैरानी की बात यह है कि शहर की करीब 400 लाइटें ऐसी हैं, जो सिर्फ तकनीकी खराबी के कारण बंद नहीं हैं, बल्कि वे लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) और नगर निगम की आपसी खींचतान और प्रशासनिक सुस्ती की भेंट चढ़ चुकी हैं। दोनों ही विभाग इन लाइटों को सुधारने की जिम्मेदारी एक-दूसरे के पाले में डाल रहे हैं।

वीआईपी इलाकों का यह हाल, तो बाकी शहर का क्या होगा?

लापरवाही की बानगी देखनी हो तो जिला सचिवालय के ठीक सामने वाले मार्ग को देख लीजिए। वीआईपी मूवमेंट वाले इस जगाधरी बस स्टैंड रोड पर सेक्टर-17 के मोड़ से लेकर बस स्टैंड तक की दर्जनों लाइटें महीनों से गुल हैं। यही आलम रक्षक विहार नाका से व्यासपुर जाने वाले स्टेट हाईवे का भी है। गुलाब नगर से लेकर सीधे जिला जेल तक जाने वाली सड़क पर रात के वक्त गाड़ी की हेडलाइट ही एकमात्र सहारा बचती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब जिला प्रशासन की नाक के नीचे की सड़कें अंधेरे में डूबी हुई हैं, तो फिर शहर के बाकी अंदरूनी वार्डों और कालोनियों की सुध कौन लेगा?

अंधेरे में बढ़ रहा हादसों का ग्राफ, असुरक्षित महसूस कर रहीं महिलाएं

इन अंधेरी सड़कों की वजह से सबसे ज्यादा परेशानी रात के समय सफर करने वाले वाहन चालकों को उठानी पड़ रही है। हाईवे पर तेज रफ्तार गाड़ियों के बीच अचानक सामने आने वाले गड्ढे या मवेशी दिखाई नहीं देते, जिससे आए दिन छोटी-मोटी दुर्घटनाएं होना आम बात हो गई है। इसके अलावा, पैदल चलने वाले राहगीरों और दफ्तरों से देर रात लौटने वाली महिलाओं के लिए यह अंधेरे रास्ते सुरक्षा के लिहाज से बड़ा खतरा बन गए हैं। असामाजिक तत्वों और झपटमारों को ऐसी अंधेरी जगहों पर वारदातों को अंजाम देना आसान हो जाता है, जिससे स्थानीय निवासियों में भारी रोष है।

बजट ठिकाने लगा, पर मेंटेनेंस करना भूले अफसर

इस पूरी परियोजना को पीडब्ल्यूडी के इलेक्ट्रिक विंग ने अंजाम दिया था ताकि शहर की सड़कों को आधुनिक रोशनी से लैस किया जा सके। कागजों पर करोड़ों रुपये खर्च भी दिखा दिए गए, लेकिन ग्राउंड जीरो पर इन लाइटों के रख-रखाव (मेंटेनेंस) के लिए कोई पुख्ता प्लानिंग नहीं की गई। अब स्थिति यह है कि जब भी परेशान शहरवासी अपनी शिकायत लेकर नगर निगम के दफ्तर जाते हैं, तो उन्हें यह कहकर टरका दिया जाता है कि यह काम पीडब्ल्यूडी का है। वहीं पीडब्ल्यूडी के पास जाने पर फाइल निगम के पाले में फेंक दी जाती है। विभागों की इस नूराकुश्ती के बीच जनता टैक्स भरने के बाद भी अंधेरे में चलने को मजबूर है।

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