अंबाला की बेटियों का बड़ा आविष्कार: दृष्टिहीनों के लिए बनाई 'जादुई छड़ी', 2 मीटर पहले ही बता देगी रास्ता
May 19, 2026 2:57 PM
अंबाला। कहा जाता है कि आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है, और जब इस आविष्कार के पीछे सामाजिक सरोकार जुड़ जाए, तो परिणाम अद्भुत होते हैं। कुछ ऐसा ही कर दिखाया है अंबाला के राजकीय पॉलिटेक्निक संस्थान की कंप्यूटर इंजीनियरिंग विंग की दो होनहार छात्राओं ने। इन बेटियों ने मिलकर एक ऐसी इलेक्ट्रॉनिक वॉकिंग स्टिक (चलने वाली छड़ी) विकसित की है, जिसे स्थानीय लोग 'जादुई छड़ी' कहकर पुकार रहे हैं। इस प्रोजेक्ट का मुख्य ध्येय दृष्टिबाधित लोगों को आत्मनिर्भर बनाना और सड़कों पर चलते समय उनके साथ होने वाली दुर्घटनाओं पर अंकुश लगाना है।
कैसे काम करती है यह अर्ली वार्निंग 'जादुई छड़ी'?
इस छड़ी की कार्यप्रणाली बेहद आधुनिक और सटीक है। इसमें विशेष प्रकार के अल्ट्रासोनिक सेंसर और कोडिंग सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया गया है। आम तौर पर जो पारंपरिक छड़ियाँ दृष्टिहीन इस्तेमाल करते हैं, उनसे रुकावट का पता तब चलता है जब छड़ी खुद उस वस्तु से टकराती है। कई बार इस चक्कर में संतुलन बिगड़ जाता है और लोग गिर जाते हैं।
लेकिन अंबाला की बेटियों द्वारा तैयार की गई इस स्मार्ट छड़ी की खासियत इसकी 'अर्ली वार्निंग' यानी वक्त से पहले सचेत करने की क्षमता है। जैसे ही यूजर इस छड़ी को लेकर आगे बढ़ेगा, यह सामने 2 मीटर (करीब 6 फीट) के दायरे में आने वाली किसी भी दीवार, खंभे, इंसानों, गड्ढों या तेज रफ्तार वाहनों को सेंस कर लेगी। खतरा भांपते ही छड़ी में लगा बीप साउंड मॉड्यूल तेजी से आवाज करने लगेगा और साथ ही इसका हैंडल जोर-जोर से वाइब्रेट होगा, जिससे यूजर को तुरंत समझ आ जाएगा कि आगे का रास्ता साफ नहीं है और वह समय रहते अपनी दिशा बदल लेगा।
बेहद किफायती और टिकाऊ है यह मॉडल
इस प्रोजेक्ट को अमलीजामा पहनाने वाली छात्राओं ने बताया कि वे अक्सर सड़क पार करते या तंग गलियों में चलते समय दृष्टिहीन भाई-बहनों को होने वाली दिक्कतों को देखती थीं, जिसने उन्हें कुछ नया करने के लिए प्रेरित किया। इस अनूठी छड़ी को बनाने के लिए उन्होंने बेहद हल्के और मजबूत प्लास्टिक पाइप, सेंसर, रिचार्जेबल बैटरी, सॉफ्टवेयर कोडिंग, लाइटिंग सिस्टम और एक अलार्म सर्किट का प्रयोग किया है।
इस पूरे प्रोजेक्ट का शुरुआती खर्च महज 7 से 8 हजार रुपये के बीच आया है। इसमें लगी बैटरी को एक बार चार्ज करके लंबे समय तक इस्तेमाल किया जा सकता है। छात्राओं का कहना है कि यह तो बस एक शुरुआत (प्रोटोटाइप) है। अगर सरकार या कोई बड़ी टेक कंपनी उनके इस प्रोजेक्ट को सपोर्ट करे, तो बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन होने से इसकी लागत को और भी कम किया जा सकता है। बेटियों की इस कामयाबी पर संस्थान के शिक्षकों और अंबाला के प्रशासनिक अधिकारियों ने उन्हें बधाई दी है और उम्मीद जताई है कि यह डिवाइस जल्द ही बाजार में उपलब्ध होगी।