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दीपिका पादुकोण की '8 घंटे की शिफ्ट' वाली मांग पर सबा आजाद का बड़ा धमाका, कहा- आज भी पीछे चल रही हमारी दुनिया

May 26, 2026 12:54 PM

Deepika Padukone's 8-Hour Shift Demand: सिनेमाई गलियारों में अक्सर चमक-धमक और स्टारडम की ही बातें होती हैं, लेकिन इसके पीछे के कामगार माहौल और कामकाजी महिलाओं के संघर्ष पर बात करने से अक्सर लोग कतराते हैं। कुछ महीनों पहले जब देश की सबसे महंगी अभिनेत्रियों में शुमार दीपिका पादुकोण ने फिल्म सेट पर काम के घंटों को सीमित कर '8 घंटे की शिफ्ट' लागू करने की मांग उठाई थी, तब कइयों ने इसे केवल एक स्टार का नखरा माना था। हालांकि, अब इस गंभीर विमर्श को आगे बढ़ाते हुए अभिनेत्री सबा आजाद ने इंडस्ट्री के भीतर के स्याह सच को आईना दिखाया है। सबा ने साफ शब्दों में कहा कि मातृत्व (मदरहुड) के दौर से गुजर रही या घर-परिवार संभाल रही महिलाओं के लिए काम के घंटों का तय होना उनका बुनियादी हक है, न कि कोई विशेषाधिकार।

प्रगतिशील घरों का खोखलापन और मैनोस्फीयर का बढ़ता खतरा

एक हालिया बातचीत में सबा आजाद ने समाज और फिल्म बिरादरी, दोनों की दोहरी मानसिकता को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि आज के दौर में भी तथाकथित आधुनिक और प्रगतिशील परिवारों का सच यही है कि औरतें दिनभर दफ्तर या सेट पर पसीना बहाने के बाद जब घर लौटती हैं, तो चूल्हा-चौका और पूरे परिवार की देखभाल का जिम्मा उन्हीं के कंधों पर आता है।

सबा ने बेहद आक्रामक लहजे में कहा, "लड़कों को कभी घर पर बैठने की नसीहत नहीं दी जाती, लेकिन लड़कियों के लिए आज भी '8 बजे के बाद बाहर मत निकलो' जैसे नियम हावी हैं। कन्या भ्रूण हत्या से लेकर घरेलू हिंसा तक की घटनाएं बदस्तूर जारी हैं। इंटरनेट पर पुरुषों के वर्चस्व की वकालत करने वाला 'मैनोस्फीयर' (Menosphere) आज भी उतना ही एक्टिव है। इन हालातों को देखकर लगता है कि हम आगे बढ़ने के बजाय उल्टे पैर पीछे की तरफ चल रहे हैं।"

क्या वाकई सुधरे हैं हालात? जेंडर पे-गैप और ओटीटी का नया दौर

सबा आजाद ने कॉलीवुड और बॉलीवुड की कार्यसंस्कृति पर सवाल उठाते हुए कहा कि कला का क्षेत्र हमेशा से रूढ़ियों को तोड़ने के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन जब बात महिलाओं को उनका वाजिब हक देने की आती है, तो पैर पीछे खींच लिए जाते हैं।

सबा ने इस बात पर हैरानी जताई कि जो महिलाएं बच्चे को जन्म देने के बाद काम पर लौटती हैं, अगर वे 8 घंटे की शिफ्ट मांग रही हैं, तो उनके संघर्ष को कमतर क्यों आंका जाता है? वेतन विसंगति पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि आज भी समान काम के लिए महिला और पुरुष कलाकारों की फीस में जमीन-आसमान का फर्क है, जिसमें सुधार की रफ्तार बेहद धीमी है।

हालांकि, बातचीत के आखिरी हिस्से में सबा ने एक उम्मीद की किरण भी दिखाई। उन्होंने सिनेमा के बदलते दौर, खासकर ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म्स की जमकर तारीफ की। सबा के मुताबिक, "ओटीटी ने स्टारडम की पुरानी रूढ़ियों को ध्वस्त कर दिया है। अब शादीशुदा होने के बाद भी अभिनेत्रियों को मुख्यधारा में बेहतरीन और दमदार किरदार ऑफर हो रहे हैं। आज बाजार में 'स्टारडम' के मुकाबले 'कंटेंट' की पूछ ज्यादा है, जो इस कड़े संघर्ष के बीच महिलाओं के लिए एक बड़ी राहत है।

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