गुरु अर्जन देव जी का शहीदी दिवस आज: तवी पर बैठकर सहा जुल्म, जानिए सिख इतिहास के पहले शहीद की पूरी गाथा
Jun 18, 2026 11:30 AM
सिख धर्म के पांचवें गुरु, श्री गुरु अर्जन देव जी का शहीदी पर्व अगाध श्रद्धा, संजीदगी और सेवा भावना के साथ मनाया गया। इतिहास के पन्नों को पलटें तो यह दिन उस सर्वोच्च और अनूठे बलिदान की याद दिलाता है, जिसने भारतीय इतिहास की दिशा बदल दी थी। इस पावन दिवस के महत्व को देखते हुए चंडीगढ़ प्रशासन ने 18 जून को केंद्र शासित प्रदेश के सभी सरकारी कार्यालयों, सार्वजनिक बोर्डों और शैक्षणिक संस्थानों में राजपत्रित (सार्वजनिक) अवकाश की घोषणा की थी, जिसके चलते गुरुवार को तमाम संस्थान बंद रहे।
तपती तवी पर बैठकर झेलीं यातनाएं, शांत रहकर स्वीकारा 'भाणा'
गुरु अर्जन देव जी सिख इतिहास के पहले गुरु थे, जिन्होंने मानवता, सत्य और धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अपनी जान न्योछावर की। सन 1606 में समय के मुगल सम्राट जहांगीर की कट्टर धार्मिक नीति और ईर्ष्या के चलते उन्हें लाहौर में बंदी बना लिया गया था। गुरु साहिब को डिगाने के लिए उन पर अमानवीय जुल्म ढाए गए; उन्हें उबलते पानी में बिठाया गया, तपती रेत सिर पर डाली गई और धधकती लोहे की तवी पर बिठाया गया। इस असहनीय प्रताड़ना के बीच भी उन्होंने प्रभु की रजा को सिर माथे पर रखा और 'तेरा कीआ मीठा लागै' का जाप करते हुए रावी नदी के ठंडे जल में विलीन हो गए।
शांत रस के कीर्तन से गूंजे गुरुद्वारे, चौक-चौराहों पर लगी ठंडे जल की छबीलें
इस ऐतिहासिक शहादत को नमन करने के लिए देश-विदेश के गुरुद्वारों में सुबह से ही संगत का सैलाब उमड़ पड़ा। विशेष प्रार्थनाएं, सुखमनी साहिब के पाठ और शांत रस के शबद-कीर्तन से पूरा माहौल भक्तिमय हो गया। चूंकि गुरु साहिब को जेठ महीने की तपती गर्मी में शहीद किया गया था, इसलिए उनकी याद में संगत द्वारा हर मुख्य मार्ग, चौक और मोहल्ले में 'छबील' (मीठे और ठंडे दूध-पानी का प्रसाद) लगाकर राहगीरों की प्यास बुझाई गई। इसके साथ ही गुरुद्वारों में बड़े स्तर पर लंगर का आयोजन किया गया, जहां हर वर्ग के लोगों ने एक पंगत में बैठकर प्रसाद ग्रहण किया।
समाज को दी श्री गुरु ग्रंथ साहिब और हरिमंदिर साहिब की सौगात
वरिष्ठ इतिहासकारों और विद्वानों का कहना है कि गुरु अर्जन देव जी का योगदान सिर्फ उनकी शहादत तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने सिख कौम को वैचारिक और आध्यात्मिक रूप से मजबूत किया। उन्होंने ही पवित्र 'आदि ग्रंथ' (श्री गुरु ग्रंथ साहिब) का संपादन किया और अमृतसर में जात-पात की दीवारों को तोड़कर चारों दिशाओं में दरवाजे वाले 'श्री हरिमंदिर साहिब' (स्वर्ण मंदिर) की नींव रखवाई। स्थानीय गुरुद्वारों के प्रबंधकों ने संगत से अपील की है कि वे गुरु साहिब के शांति, सहिष्णुता और मानवता के संदेश को अपने जीवन में उतारें।