दादरी में गैस का 'हाहाकार': क्लासरूम छोड़कर एजेंसियों के बाहर छात्र
Mar 17, 2026 3:57 PM
हरियाणा। हरियाणा के चरखी दादरी जिले में रसोई गैस (LPG) का संकट गहराता जा रहा है। आलम यह है कि जो समय छात्र-छात्राओं को कॉलेज की लाइब्रेरी या क्लासरूम में बिताना चाहिए था, वह अब गैस एजेंसियों के बाहर तपती धूप में कतारों में बीत रहा है। परीक्षाओं का दौर सिर पर है, लेकिन भविष्य बनाने की चिंता पर पेट की आग भारी पड़ रही है। दादरी मुख्यालय पर सुबह 9 बजे से ही गैस सिलेंडर के लिए मारामारी शुरू हो जाती है। कॉलेज छात्र मंजीत और सकीला की आपबीती इस संकट की गंभीरता को बयां करती है। उन्होंने बताया कि गांवों में गैस की गाड़ियां आनी बंद हो गई हैं, जिसके चलते उन्हें मजबूरी में अपनी पढ़ाई छोड़कर कई किलोमीटर दूर शहर आकर लाइन में लगना पड़ रहा है।
गांवों में सप्लाई ठप, 45 दिन वाला नया नियम बना जी का जंजाल
प्रशासनिक कुप्रबंधन और आपूर्ति की कमी का खामियाजा ग्रामीण इलाकों को सबसे ज्यादा भुगतना पड़ रहा है। गांवों में सप्लाई चैन पूरी तरह चरमरा गई है, जिससे पूरा दबाव शहर की एजेंसियों पर आ गया है। इस बीच, गैस बुकिंग को लेकर सरकार के '45 दिन वाले नए नियम' ने आग में घी डालने का काम किया है। अब उपभोक्ताओं को एक सिलेंडर लेने के बाद अगले 45 दिनों तक दोबारा बुकिंग की अनुमति नहीं होगी। स्थानीय गृहिणी सरिता ने आक्रोश जताते हुए कहा कि घर का कामकाज और पशुओं का चारा छोड़कर महिलाएं घंटों लाइन में खड़ी हैं। गैस के बिना चूल्हा ठंडा पड़ा है और बुजुर्ग महिलाएं भी इस धक्का-मुक्की में पिस रही हैं।
किसानों और मजदूरों पर दोहरी मार: फसलों की कटाई या गैस की लाइन?
यह संकट ऐसे समय में आया है जब हरियाणा का किसान फसलों की कटाई और मंडियों की तैयारी में व्यस्त है। खेतों में काम करने का सीजन होने के कारण मजदूरों और किसानों के पास समय की भारी कमी है, लेकिन घर में गैस न होने की वजह से उन्हें अपना काम छोड़कर सिलेंडर के लिए भटकना पड़ रहा है। उपभोक्ताओं की मांग है कि अगर सप्लाई में कमी है, तो कम से कम टोकन सिस्टम को ऑनलाइन और पारदर्शी बनाया जाए ताकि लोगों का पूरा दिन बर्बाद न हो। प्रशासन की ओर से अब तक कोई ठोस आश्वासन न मिलने के कारण दादरी के लोगों में रोष बढ़ता जा रहा है।
बदहाल व्यवस्था: टोकन के चक्कर में बर्बाद हो रहा भविष्य
छात्रों का कहना है कि डिजिटल इंडिया के दौर में उन्हें फिजिकल लाइनों में लगकर टोकन लेना पड़ रहा है, जो अपने आप में एक विरोधाभास है। सकीला जैसी छात्राएं जो अपनी डिग्री पूरी करने का सपना देख रही हैं, उन्हें डर है कि इस अव्यवस्था के चलते उनकी अटेंडेंस और पढ़ाई दोनों प्रभावित हो रही है। यदि जल्द ही ग्रामीण क्षेत्रों में गैस की गाड़ियां नहीं भेजी गईं और 45 दिन के सख्त नियम में ढील नहीं दी गई, तो आने वाले दिनों में यह जन-आक्रोश सड़कों पर उतर सकता है। फिलहाल, दादरी की जनता बस इसी उम्मीद में है कि उनकी रसोई का चूल्हा और बच्चों का भविष्य दोनों दोबारा पटरी पर लौट सकें।