शाहाबाद मीरी-पीरी संस्थान अब झींडा गुट के पास, हाईकोर्ट के फैसले से SGPC को लगा बड़ा झटका
May 12, 2026 3:11 PM
कुरुक्षेत्र। कुरुक्षेत्र के शाहाबाद में जीटी रोड पर स्थित मीरी-पीरी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च सेंटर को लेकर साल 2022 से चल रहा कानूनी घमासान मंगलवार को निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के जस्टिस जगमोहन बंसल की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए मीरी-पीरी चैरिटेबल ट्रस्ट की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें हरियाणा सिख गुरुद्वारा मैनेजमेंट कमेटी (HSGMC) के दखल को चुनौती दी गई थी। कोर्ट के इस फैसले के साथ ही अब इस विशाल मेडिकल संस्थान की सेवा-संभाल और प्रबंधन का पूरा जिम्मा आधिकारिक तौर पर हरियाणा कमेटी के हाथों में आ गया है।
झींडा ने संभाली कमान, कर्मचारियों को दिया भरोसा
फैसले की खबर मिलते ही कुरुक्षेत्र स्थित HSGMC मुख्यालय में हलचल तेज हो गई। कमेटी के प्रधान जगदीश सिंह झींडा ने तुरंत सदस्यों और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ बैठक कर आगे की रूपरेखा तैयार की। झींडा ने मीडिया से रूबरू होते हुए स्पष्ट किया कि इस बदलाव से संस्थान के कामकाज पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा। उन्होंने कहा, "संगत की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए प्रबंधन चलाया जाएगा। न तो किसी कर्मचारी को नौकरी से निकाला जाएगा और न ही संस्थान का ऐतिहासिक नाम बदला जाएगा। हमारा एकमात्र लक्ष्य यहां स्वास्थ्य सेवाओं को और बेहतर बनाना है।"
2022 से 2026 तक: विवाद की पूरी कहानी
इस विवाद की जड़ें साल 2022 में हैं, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सिख गुरुद्वारा मैनेजमेंट कमेटी की वैधता पर मुहर लगाई थी। इसके बाद सितंबर 2024 में HSGMC ने संस्थान की चिकित्सा व्यवस्था को सुधारने के लिए एक मेडिकल बोर्ड का गठन किया। ट्रस्ट ने इसे अपने निजी मामलों में सीधा हस्तक्षेप करार देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अक्टूबर 2024 में कोर्ट ने बोर्ड के गठन पर स्टे लगा दिया था, जो करीब डेढ़ साल तक जारी रहा। आज हुई अंतिम सुनवाई में कोर्ट ने ट्रस्ट की दलीलों को अपर्याप्त मानते हुए याचिका का निपटारा कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट तक खिंच सकती है कानूनी लड़ाई
भले ही हाईकोर्ट ने हरियाणा कमेटी का रास्ता साफ कर दिया हो, लेकिन अमृतसर स्थित शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) इस फैसले को आसानी से स्वीकार करती नहीं दिख रही। एसजीपीसी से जुड़े नेताओं का तर्क है कि वे हर साल इस संस्थान के रख-रखाव पर करोड़ों रुपये खर्च करते हैं। सूत्रों की मानें तो एसजीपीसी के विधि विशेषज्ञ इस फैसले का अध्ययन कर रहे हैं और जल्द ही इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। पूर्व उपाध्यक्ष हरभजन मसाना ने पहले ही संकेत दिए थे कि वे अपने हक की लड़ाई देश की सबसे बड़ी अदालत तक लड़ेंगे।