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वृंदावन में क्यों रुकी प्रेमानंद जी की पदयात्रा? किडनियों की बीमारी और एकांतवास पर संत ने तोड़ी चुप्पी

May 25, 2026 3:31 PM

मथुरा। वृंदावन के विख्यात संत प्रेमानंद महाराज के करोड़ों भक्तों के लिए पिछला एक हफ्ता बेहद चिंताजनक रहा है। उनके खराब स्वास्थ्य की खबरों के बीच, रविवार को केली कुंज आश्रम ट्रस्ट के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर महाराजश्री का एक बेहद भावुक वीडियो संदेश जारी किया गया। करीब सवा मिनट के इस वीडियो में संत ने अपने शिष्यों को ढांढस बंधाते हुए कहा, "बिल्कुल चिंता मत करो। हम मिलें न मिलें, बोलें न बोलें, हम आप सबको बहुत प्यार करते हैं। अंतिम बात यही कि चिंता नहीं करनी।" उन्होंने आगे कहा कि भक्त यह न सोचें कि गुरु के मौन रहने से उनका मार्गदर्शन कैसे होगा, क्योंकि बिना बोले भी वे अपने शिष्यों के अंतर्मन में वास करते रहेंगे।

9 दिनों से थमे कदम, २० हजार भक्तों की भीड़ को लौटना पड़ रहा मायूस

दरअसल, 17 मई की सुबह से ही प्रेमानंद महाराज की वह दिनचर्या थम गई है, जिसकी एक झलक पाने के लिए देश-विदेश से लोग खिंचे चले आते हैं। वे हर रोज तड़के 3 बजे अपने केली कुंज आश्रम से सौभरी वन के लिए करीब डेढ़ किलोमीटर की पदयात्रा पर पैदल निकलते थे। आम दिनों में भी इस मार्ग पर करीब 20 हजार और वीकेंड्स पर लाखों श्रद्धालुओं की कतारें लगती थीं।

17 मई की भोर जब महाराजश्री नहीं निकले, तो उनके शिष्यों ने लाउडस्पीकर से घोषणा की कि अस्वस्थता के कारण पदयात्रा रद्द की जा रही है। हालांकि, तीन दिन पहले महाराजश्री को अपने आश्रम से निकलकर वराह घाट स्थित अपने गुरु संत गोविंद शरण महाराज के दर्शनों के लिए जाते हुए देखा गया था, जिससे उनके प्रशंसकों ने थोड़ी राहत की सांस ली थी।

"मेरा मौन आपके लिए है"— किडनी की गंभीर बीमारी के बावजूद अनवरत साधना

यह किसी से छिपा नहीं है कि प्रेमानंद महाराज की दोनों किडनियां लंबे समय से पूरी तरह निष्क्रिय हैं और वे हफ्ते में दो से तीन बार होने वाली कष्टदायक डायलिसिस प्रक्रिया के सहारे जीवन यापन कर रहे हैं। इस असहनीय शारीरिक पीड़ा के बावजूद उनकी आध्यात्मिक ऊर्जा में कोई कमी नहीं दिखी है।

अपने संदेश में उन्होंने स्पष्ट किया, "हम एकांतवास कर रहे हैं। यह एकांतवास आपके लिए है, हमारे लिए नहीं। हमारे लिए हम भजन नहीं कर रहे। हमारा जो कुछ होना था, वो हो गया। जो कुछ हो रहा है, वह सब आपके लिए हो रहा है। खूब भजन करो, नाम जप करो, आश्रित रहो और सुखी रहो।"

अनिरुद्ध पांडे से प्रेमानंद बनने तक की आध्यात्मिक यात्रा

कानपुर जिले की नरवल तहसील के अखरी गांव में शंभू नारायण पांडे और रामा देवी के घर जनमे बचपन के 'अनिरुद्ध कुमार पांडे' की अध्यात्म की राह बेहद दिलचस्प रही है। 13 साल की उम्र में समाज के कुछ लोगों द्वारा शिव मंदिर का चबूतरा बनाने से रोके जाने पर उनका मन ऐसा उचाट हुआ कि उन्होंने घर छोड़ दिया। कानपुर से काशी पहुंचे अनिरुद्ध 'आरयन ब्रह्मचारी' बने और गुरु गौरी शरण जी महाराज से दीक्षा ली।

बाद में जब वे मथुरा-वृंदावन आए, तो बांके बिहारी की भक्ति और परिक्रमा के दौरान सुनी गई एक सखी के मुख से राधा-रस की महिमा ने उनके संन्यास के स्वरूप को ही बदल दिया। वे संन्यास धर्म की मर्यादाओं को पार कर पूर्ण रूप से 'राधावल्लभी' संत हो गए। आज देश के सबसे प्रभावशाली संतों में गिने जाने वाले प्रेमानंद महाराज का यह संदेश उनके अनुयायियों के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है।

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