Shravan Kumar Bahu: कलयुग की श्रवण कुमार! 85 साल की सास को टब में बैठाकर 84 कोस की परिक्रमा करा रही बहू काजल
Jun 12, 2026 5:31 PM
नूंह (मेवात) के रास्ते गुजर रही ब्रज 84 कोस परिक्रमा के दौरान सेवा और संस्कारों का एक ऐसा अनूठा मंजर देखने को मिला, जिसने आधुनिक दौर के बिखरते संयुक्त परिवारों को आईना दिखा दिया है। मथुरा के कोसीकलां की रहने वाली बहू प्रीति उर्फ काजल चौधरी अपनी 85 वर्षीय बुजुर्ग सास चंद्रो देवी की इच्छा पूरी करने के लिए उन्हें बकायदा एक टब में बैठाकर इस कठिन यात्रा पर निकल पड़ी हैं। मेवात क्षेत्र के बिछौर गांव पहुंचने पर हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों ने मिलकर इस आधुनिक 'श्रवण कुमार' का ऐतिहासिक स्वागत किया।
आज के इस दौर में जहां जरा सी अनबन पर संयुक्त परिवार बिखर जाते हैं और बुजुर्गों को वृद्धाश्रम की राह देखनी पड़ती है, वहीं हरियाणा और उत्तर प्रदेश की सीमा से सटे ब्रजमंडल में एक बहू ने सेवा और समर्पण की ऐसी अमर कहानी लिख दी है जिसकी गूंज दूर-दूर तक सुनाई दे रही है। मथुरा जिले के कोसीकलां की रहने वाली प्रीति उर्फ काजल चौधरी ने साबित कर दिया है कि यदि मन में सच्ची श्रद्धा और अपनों के प्रति सम्मान हो, तो कलयुग में भी त्रेतायुग के संस्कार जिंदा रखे जा सकते हैं। काजल अपनी 85 वर्ष की निशक्त सास चंद्रो देवी को एक प्लास्टिक के बड़े टब में बैठाकर ब्रज 84 कोस की अत्यंत कठिन धार्मिक परिक्रमा पैदल करा रही हैं।
आस्था के आगे बौनी साबित हुईं शारीरिक दूरियां, 31 मई से अनवरत जारी है सफर
दरअसल, ढलती उम्र और शारीरिक लाचारी के चलते बुजुर्ग चंद्रो देवी सदियों से चली आ रही इस पवित्र परिक्रमा को करने में असमर्थ थीं, लेकिन उनके मन में ब्रज भूमि को नमन करने की वर्षों पुरानी तीव्र इच्छा दबी हुई थी। जब इस बात का अहसास उनकी बहू काजल को हुआ, तो उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी सास के इस सपने को अपना संकल्प बना लिया। काजल ने 31 मई को पलवल जिले के ऐतिहासिक गांव बंचारी से इस पैदल यात्रा का शंखनाद किया था। चिलचिलाती धूप और पथरीले रास्तों की परवाह किए बिना वह हर रोज अपनी सास को टब के सहारे आगे लेकर बढ़ रही हैं। रास्ते में पड़ने वाले हर गांव के लोग इस अद्भुत दृश्य को देखकर अपनी आंखें नम करने से नहीं रोक पा रहे हैं।
जब मेवात के बिछौर गांव में थमीं मजहबी दीवारें, नोटों की माला से हुआ अभिनंदन
शुक्रवार को जब यह परिक्रमा यात्रा मेवात (नूंह) क्षेत्र के बिछौर गांव की सीमा में दाखिल हुई, तो वहां का नजारा कौमी एकता और इंसानियत की जीती-जागती मिसाल बन गया। काजल और उनकी सास के स्वागत में धर्म की सारी दीवारें ढह गईं। हिंदू और मुस्लिम समाज के सैकड़ों ग्रामीण एक सुर में इस बहू की सेवा भावना को नमन करने सड़क पर उतर आए। ग्रामीणों ने डीजे की धुनों के बीच दोनों पर जमकर फूलों की बारिश की, उन्हें मालाएं पहनाईं और स्थानीय परंपरा के अनुसार नोटों की माला भेंट कर सम्मानित किया।
इस भावुक पल पर काजल चौधरी ने रुंधे गले से कहा, "मेरी सास मेरे लिए सिर्फ एक सास नहीं, बल्कि मेरी सगी मां हैं। जब वे खुद चलने में लाचार हो गईं, तो एक बेटी होने के नाते मेरा यह फर्ज था कि मैं उनकी आस्था को अधूरा न रहने दूं। यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे उनकी सेवा का यह जरिया मिला।"
"यह मजहब नहीं, इंसानियत का कारवां है" - बोले मेवात के नुमाइंदे
काजल के इस असाधारण कदम से अभिभूत होकर जल अभिषेक यात्रा कमेटी के अध्यक्ष नाथूराम ने कहा कि मेवात की आबोहवा हमेशा से भाईचारे की रही है और आज इस बहू के स्वागत ने उस परंपरा को और मजबूत किया है। वहीं स्थानीय प्रधान इस्माइल और ग्रामीण जुनेद ने साझा किया, "आज की तारीख में जहां सगे बच्चे मां-बाप को छोड़ देते हैं, वहां एक बहू का यह त्याग पूरे समाज को एक सकारात्मक दिशा देता है। यह कोई साधारण धार्मिक यात्रा नहीं है, यह असल में इंसानियत, सम्मान और बुजुर्गों के प्रति हमारी सामूहिक जिम्मेदारी का जीता-जागता संदेश है।"
करीब दो सप्ताह से अधिक समय की इस बेहद कठिन आध्यात्मिक और शारीरिक परीक्षा के बाद, यह यात्रा शनिवार को वापस पलवल के बंचारी गांव पहुंचकर विधिवत रूप से संपन्न हो जाएगी। लेकिन काजल द्वारा छोड़ा गया यह पदचिह्न आने वाली कई पीढ़ियों को पारिवारिक मर्यादाओं की याद दिलाता रहेगा।