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संवेदनशील सियासत, असंवेदनशील परिणाम—नारी के हिस्से अंतहीन इंतज़ार !

Apr 19, 2026 5:23 PM

मयंक मिश्रा

भारतीय लोकतंत्र के विराट आकाश में एक स्वर दशकों से अनवरत गूंजता रहा है—आधा आसमान, आधी भागीदारी। नारी शक्ति वंदन अधिनियम उसी स्वर को विधान की संपूर्णता देने का स्वप्न था; एक ऐसा स्वप्न, जिसमें सत्ता के गलियारों में स्त्री की उपस्थिति प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि निर्णायक हो। किंतु विडंबना यह है कि हर बार जब यह स्वप्न आकार लेने को होता है, राजनीति की धुंध उसे फिर किसी अनिश्चित क्षितिज पर टाल देती है। यह ठहराव अब मात्र प्रक्रियागत विलंब नहीं रहा, बल्कि उस सामूहिक असमर्थता का दर्पण बन चुका है, जिसमें इरादे भाषणों में प्रखर और निर्णयों में निर्बल दिखाई देते हैं। यह उस व्यवस्था का मौन स्वीकार भी है, जो स्त्री की शक्ति का गुणगान तो करती है, पर उसे सत्ता में बराबरी देने के क्षण पर असहज हो उठती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राष्ट्र के नाम संबोधन, उनकी क्षमा-याचना और यह स्वीकार कि यह इस सदी के महत्वपूर्ण कदमों में से एक है—निस्संदेह संवेदना के सधे हुए वाक्य हैं। उनका यह कथन—“नारी अपना अपमान कभी नहीं भूलती… विपक्ष ने जो पाप किया है, उसकी सज़ा जरूर मिलेगी”—इस बहस को और अधिक तीक्ष्ण बना देता है। इस कथन के माध्यम से प्रधानमंत्री ने विपक्ष के रुख को केवल असहमति नहीं, बल्कि नैतिक चूक के रूप में प्रस्तुत किया है। यह आरोप सीधे-सीधे विपक्ष की नीयत और उसकी प्रतिबद्धता पर सवाल खड़ा करता है—मानो महिला आरक्षण का विरोध, केवल एक नीतिगत मतभेद नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के विरुद्ध खड़े होने जैसा हो।

किन्तु लोकतंत्र की स्मृति भावनाओं से नहीं, क्रियान्वयन की ठोस रेखाओं से अंकित होती है। जब शब्द बार-बार संकल्प का स्थान लेते हैं, तो वे आश्वासन नहीं, प्रतीक्षा के नए अध्याय बन जाते हैं। और इसी लंबी प्रतीक्षा के बीच विपक्ष का आचरण इस पूरे विमर्श को और अधिक संदिग्ध बना देता है। सिद्धांततः समर्थन और व्यवहार में अवरोध—यह विरोधाभास अब छिपा नहीं है। एक ओर 33 प्रतिशत आरक्षण के समर्थन का उद्घोष, और दूसरी ओर परिसीमन व जनगणना के आधार पर आपत्तियों की दीवार—यह केवल तकनीकी मतभेद नहीं, बल्कि एक सुनियोजित संकोच का संकेत है।

आश्चर्य होता है कि लोकसभा चुनावों के समय जो दल ‘संविधान बचाने’ की दुहाई देते नहीं थकते थे, वही आज डॉ.बीआर अंबेडकर  के उस मूल संवैधानिक स्वप्न—समानता और समावेशिता—को व्यवहार में कुचलते दिखाई देते हैं। यह केवल राजनीतिक विरोधाभास नहीं, बल्कि उस नैतिक विफलता का द्योतक है, जहां आदर्शों की घोषणाएं तो ऊंची हैं, पर उन्हें जीने का साहस क्षीण पड़ जाता है। संविधान का नाम लेना सरल है, किंतु उसकी आत्मा को स्वीकार करना कठिन। और जब वही दल, जो स्वयं को उसके रक्षक के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं, समान प्रतिनिधित्व जैसे मूल प्रश्न पर पीछे हटते नजर आते हैं, तब यह संदेह स्वाभाविक हो जाता है कि कहीं ‘संविधान बचाने’ का नारा भी केवल अवसर की राजनीति का औजार तो नहीं था।

‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के लिए आवश्यक संविधान संशोधन विधेयक का सदन में पारित न हो पाना, विपक्ष की उसी दोहरी राजनीति से परिचित कराती है, जो प्रगतिशीलता का दावा तो करती है, पर निर्णय के क्षण पर सत्ता-समीकरणों के आगे ठिठक जाती है। लोकतंत्र केवल बहुमत का गणित नहीं, वह मूल्य, मर्यादा और नैतिक साहस का विधान है। किंतु जब यही लोकतंत्र उस प्रस्ताव के सामने ठहर जाए, जो आधी आबादी को निर्णय के केंद्र में स्थापित करने का साहस रखता हो, तब प्रश्न केवल एक विधेयक का नहीं, उस जड़ मानसिकता का हो जाता है, जो परिवर्तन की दहलीज़ तक तो पहुंचती है, पर उसे पार करने का साहस नहीं जुटा पाती।

लोकसभा की सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव और उसके साथ परिसीमन की अनिवार्यता—यह एक व्यापक पुनर्संरचना का संकेत है। किंतु 2011 की जनगणना के आधार पर इस प्रक्रिया का विरोध करते हुए वर्तमान ढांचे में ही आरक्षण लागू करने की मांग, इस पूरे विमर्श को द्वंद्व में डाल देती है। प्रश्न अब यह नहीं रह जाता कि आरक्षण होना चाहिए या नहीं—प्रश्न यह है कि क्या इसे वास्तव में लागू होते देखना भी सभी पक्ष चाहते हैं? संसद में हुई तीखी नोकझोंक इस असहज सत्य को उजागर करती है कि नारी सशक्तिकरण का यह प्रश्न अब भी राजनीतिक गणित की बिसात पर रखा एक मोहरा बना हुआ है। इस द्वंद्व में सबसे अधिक क्षति उस विश्वास की होती है, जो लोकतंत्र की आत्मा है।

परंतु इतिहास साक्षी है—भारत की नारी कभी पराजित नहीं होती; वह समय की कठोर शिलाओं पर अपने अधिकार की रेखाएं स्वयं अंकित करती है। उसे रोका जा सकता है, विलंबित किया जा सकता है, किंतु उसकी यात्रा को स्थगित नहीं किया जा सकता। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा द्वारा इस प्रश्न को जिस स्पष्टता, निरंतरता और दृढ़ स्वर में उठाया गया है, वह इसे क्षणिक राजनीतिक बहस से ऊपर उठाकर एक दीर्घकालिक राष्ट्रीय संकल्प का रूप देता है। यह संघर्ष सत्ता का नहीं, उस आत्मा का है, जो भारत की चेतना में समानता और सम्मान के रूप में धड़कती है।

पुरुष हो या महिला—जीवन के अधिकांश कर्मक्षेत्र अपने-अपने दायरों में बंधे होते हैं; उनकी सीमाएँ स्पष्ट होती हैं, उनका प्रभाव निश्चित परिधि तक सिमटा रहता है। किंतु राजनीति एक ऐसा विराट मंच है, जहाँ संभावनाएँ सीमाओं को लांघ जाती हैं और एक निर्णय समय की दिशा तक बदल देता है। एक महिला वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशाला में नए सत्य खोज सकती है, एक शिक्षिका अपनी कक्षा में भविष्य गढ़ सकती है, परंतु एक महिला सांसद पूरे राष्ट्र की नियति को नई दिशा देने का सामर्थ्य रखती है। इसलिए 273 सीटों का आरक्षण कोई साधारण संख्या नहीं, यह उस स्वप्न की आधारशिला है, जिसमें समानता केवल विचार नहीं, व्यवस्था का स्वरूप बनती है। यह उस भविष्य का उद्घोष है, जहाँ स्त्री की उपस्थिति केवल प्रतीक नहीं, परिवर्तन की धुरी बनती है—जहाँ उसका स्वर निर्णय का आधार बनता है, और उसकी दृष्टि राष्ट्र की दिशा।

और अब जब यह प्रश्न सियासत की बिसात पर आ खड़ा हुआ है, तो जिज्ञासा स्वाभाविक है—जीत किसकी हुई? विपक्ष भले ही अपनी चालों को सफलता का नाम देकर उत्सव का भ्रम रचे, किंतु इतिहास की दृष्टि इतनी सतही नहीं होती। इस बिसात पर चित और पट का अंतर उतना निर्णायक नहीं, जितना यह कि किसने मुद्दे को जीवित रखा और किसने उसे उलझनों में बांधने का प्रयास किया। दरअसल, यह वह खेल नहीं है, जहां एक पक्ष की हार दूसरे की जीत बन जाए। यहां हर टली हुई सुबह, हर स्थगित निर्णय, उस आधी आबादी के अधिकारों को और प्रखर बना देता है, जो प्रतीक्षा में है। यदि विपक्ष इसे अपनी जीत मान भी ले, तो यह वैसी ही जीत होगी, जिसमें क्षणिक संतोष तो है, पर नैतिक ऊंचाई का अभाव है।

समय की धारा अंततः उसी दिशा में बहती है, जहां संकल्प की दृढ़ता और उद्देश्य की स्पष्टता होती है। ऐसे में यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि इस बिसात पर परिणाम चाहे जो दिखे, पर इतिहास की अंतिम पंक्ति उसी के पक्ष में लिखी जाएगी, जिसने इस प्रश्न को टालने नहीं, सुलझाने का साहस दिखाया। क्योंकि नारी के अधिकारों की यह कथा किसी एक दिन, एक बहस या एक मतदान की नहीं—यह उस अविरल यात्रा की कहानी है, जो अंततः अपने गंतव्य तक पहुंचकर ही दम लेती है। समय की पुकार स्पष्ट है—नारी शक्ति को प्रतीक्षा में बांधकर कोई भी व्यवस्था स्वयं को प्रगतिशील नहीं कह सकती। अब या तो यह अधिनियम इतिहास रचेगा, या इतिहास इसे एक और अधूरे वादे के रूप में दर्ज करेगा—जहां शब्दों की ऊंचाई, निर्णयों की गहराई से पराजित हो गई। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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