Aadhaar Card Row: क्या आधार से मिल रही है अवैध प्रवासियों को नागरिकता? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को थमाया नोटिस
Jun 16, 2026 6:18 PM
नई दिल्ली। क्या आधार कार्ड का इस्तेमाल उन जगहों और दावों के लिए किया जा रहा है, जिसके लिए कानूनन इसे कभी बनाया ही नहीं गया था? इस बेहद संवेदनशील और दूरगामी असर वाले कानूनी सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने तल्ख रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने मंगलवार को एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार के साथ-साथ देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी कर पूछा है कि आखिर आधार को नागरिकता, जन्मतिथि और मूल निवास के अकाट्य प्रमाण के रूप में क्यों स्वीकार किया जा रहा है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने मशहूर वकील और सामाजिक कार्यकर्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से दायर याचिका पर यह कदम उठाया है। याचिका में साफ तौर पर मांग की गई है कि व्यवस्था में जारी इस बड़ी चूक को तुरंत सुधारा जाए और आधार कार्ड की भूमिका को केवल और केवल व्यक्ति की पहचान की पुष्टि (बायोमेट्रिक व डेमोग्राफिक वेरिफिकेशन) तक सीमित करने के सख्त निर्देश दिए जाएं।
याचिकाकर्ता के दो अकाट्य तर्क: जब कानून मना करता है, तो सिस्टम क्यों मानता है?
अदालत के सामने याचिकाकर्ता ने अपने दावों को पुख्ता करने के लिए दो बेहद मजबूत और कानूनी दस्तावेज पेश किए:
आधार अधिनियम की धारा 9: इस कानून में बड़े ही साफ लफ्जों में लिखा गया है कि आधार संख्या को किसी भी स्थिति में भारत की नागरिकता या किसी राज्य के मूल निवास (डोमिसाइल) का कानूनी प्रमाण नहीं माना जा सकता।
UIDAI की 22 अगस्त 2023 की अधिसूचना: आधार जारी करने वाली संस्था भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) ने खुद साल 2023 में एक सर्कुलर जारी कर स्पष्ट किया था कि यह कार्ड महज एक 'पहचान पत्र' है, न कि जन्मतिथि, नागरिकता या स्थाई पते को प्रमाणित करने वाला कोई दस्तावेज।
इसके बावजूद जमीनी हकीकत बिल्कुल उलट है। याचिका में देश भर के प्रशासनिक ढर्रे पर उंगली उठाते हुए कहा गया है कि आज भी अधिकांश स्कूलों में दाखिले, जमीनों व संपत्तियों की खरीद-बिक्री, जन्म प्रमाण पत्र बनवाने, राशन कार्ड और यहां तक कि ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने जैसी गंभीर प्रक्रियाओं में धड़ल्ले से आधार को ही उम्र और नागरिकता का अंतिम सच मान लिया जाता है।
घुसपैठियों को मिल रहा सेफ पैसेज, वोटर लिस्ट पर भी उठे सवाल
पत्रकारिता और राष्ट्रीय सुरक्षा के चश्मे से देखें तो इस याचिका का सबसे डराने वाला पहलू इसकी क्रोनोलॉजी में छिपा है। याचिका में अंदेशा जताया गया है कि इस प्रशासनिक ढील का फायदा उठाकर सीमा पार से आने वाले घुसपैठिए और अवैध प्रवासी बेहद आसानी से आधार बनवा लेते हैं। बाद में इसी आधार के दम पर वे देश के अन्य संवेदनशील और वैध दस्तावेज (जैसे पासपोर्ट या वोटर आईडी) हासिल करने में कामयाब हो जाते हैं, जिससे उन्हें ट्रैक करना नामुमकिन हो जाता है।
इतना ही नहीं, चुनावी प्रक्रिया की शुचिता पर सवाल उठाते हुए याचिका में कहा गया है कि मतदाता पंजीकरण के समय 'फॉर्म-6' के तहत होने वाली जांच इतनी सतही है कि बिना पुख्ता दस्तावेजों के भी गैर-कानूनी लोगों के नाम मतदाता सूची में शामिल हो रहे हैं। इस राष्ट्रीय खतरे से निपटने के लिए याचिकाकर्ता ने मांग की है कि देश की पूरी चुनावी सत्यापन व्यवस्था का 'ओवरहॉल' (व्यापक सुधार) किया जाए। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट के किसी सेवानिवृत्त जज, साइबर सुरक्षा दिग्गजों और फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स की एक हाई-लेवल कमिटी बनाकर इस पूरे घालमेल की निगरानी कराई जाए।
याद आया 2018 का वो ऐतिहासिक फैसला
यह पहली बार नहीं है जब आधार की सीमाओं को लेकर देश की सबसे बड़ी अदालत का दरवाजा खटखटाया गया हो। इससे पहले 26 सितंबर 2018 को पांच जजों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से आधार कानून की संवैधानिकता को तो बरकरार रखा था, लेकिन उसके रेंगते हुए पंखों को कतर दिया था। उस ऐतिहासिक फैसले में साफ कहा गया था कि बैंक खाते खोलने, मोबाइल का नया सिम लेने या स्कूलों में बच्चों के एडमिशन के लिए आधार को अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता। हालांकि, गरीब तबके तक सरकारी सब्सिडी और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ बिना किसी भ्रष्टाचार के पहुंचाने के लिए इसके इस्तेमाल को हरी झंडी दी गई थी। अब देखना यह है कि 2018 के उस फैसले के बावजूद सिस्टम में जो कमियां रह गईं, उन पर केंद्र और राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट में क्या सफाई पेश करती हैं।