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चैत्र नवरात्रि का चौथा व्रत: जानें मां दुर्गा के चौथे स्वरूप मां कूष्मांडा की पूजा विधि और महत्व

Mar 21, 2026 4:22 PM

Chaitra Navratri 2026: चैत्र नवरात्रि 2026 का चौथा दिन 22 मार्च, रविवार को पड़ रहा है, जिसे चैत्र शुक्ल चतुर्थी के रूप में जाना जाता है। इस दिन मां दुर्गा के चौथे स्वरूप मां कूष्मांडा की पूजा की जाती है। नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च से होकर 27 मार्च तक चलेगी, जिसमें चौथा दिन विशेष रूप से देवी कूष्मांडा को समर्पित होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन विधिपूर्वक पूजा करने से साधक को ऊर्जा, स्वास्थ्य और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।

मां कूष्मांडा का धार्मिक महत्व

मां कूष्मांडा को सृष्टि की आदिशक्ति माना जाता है। धर्म ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि देवी ने अपनी हल्की मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की थी। जब चारों ओर अंधकार था, तब उन्होंने अपनी दिव्य शक्ति से सृष्टि की उत्पत्ति की। इसी कारण उन्हें ब्रह्मांड की जननी कहा जाता है। नवरात्रि के चौथे दिन उनकी पूजा करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और रचनात्मकता बढ़ती है।

मां कूष्मांडा का स्वरूप और विशेषताएं

देवी कूष्मांडा का स्वरूप अत्यंत शांत और सौम्य माना जाता है। उनकी आठ भुजाएं हैं और वे सिंह की सवारी करती हैं। उनके हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल, अमृत से भरा कलश, चक्र, गदा और जाप माला होती है। यह भी माना जाता है कि देवी सूर्य मंडल के मध्य में निवास करती हैं और उसी से समस्त ऊर्जा का संचालन करती हैं। उनका यह रूप शक्ति और संतुलन का प्रतीक है।

पूजन सामग्री और तैयारी

मां कूष्मांडा की पूजा के लिए कलावा, कुमकुम, अक्षत, घी, धूप, चंदन, तिल और पीले रंग की मिठाइयों का विशेष महत्व है। इसके अलावा पीले वस्त्र और चूड़ियां भी पूजा में शामिल की जाती हैं। पूजा से पहले स्थान को साफ करना और शुद्धता बनाए रखना आवश्यक माना जाता है। भक्त पीले वस्त्र पहनकर पूजा करते हैं, जिससे देवी की कृपा प्राप्त होती है।

पूजा विधि का विस्तृत तरीका

पूजा की शुरुआत स्नान के बाद साफ और पीले वस्त्र धारण करके की जाती है। सबसे पहले कलश की स्थापना और पूजा की जाती है। इसके बाद हाथ में फूल लेकर मां कूष्मांडा का ध्यान करते हुए मंत्र जाप किया जाता है। देवी को पंचामृत से स्नान कराया जाता है और घी का दीपक जलाया जाता है। इसके बाद कुमकुम, चंदन और लाल फूल अर्पित किए जाते हैं। अंत में ‘ॐ कुष्माण्डायै नमः’ मंत्र का जाप और आरती की जाती है।

भोग और प्रसाद का महत्व

मां कूष्मांडा को पीला रंग अत्यंत प्रिय है, इसलिए भोग में केसर पेठा, केसरिया हलवा और अन्य पीले पकवान अर्पित किए जाते हैं। कुछ श्रद्धालु सफेद पेठे का फल भी चढ़ाते हैं। इसके अलावा मालपुआ, बताशे, दही और हलवा भी देवी को प्रिय माने जाते हैं। व्रत रखने वाले भक्त सिंघाड़े या आलू के आटे से बने हलवे का भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करते हैं।

पूजा के लाभ और मान्यताएं

ऐसी मान्यता है कि मां कूष्मांडा की पूजा करने से जीवन के कष्ट, रोग और शोक समाप्त होते हैं। उनकी कृपा से साधक को दीर्घायु और यश प्राप्त होता है। दुर्गा सप्तशती में भी देवी को चराचर जगत की अधिष्ठात्री बताया गया है। श्रद्धा और नियमपूर्वक पूजा करने से भक्त को मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति मिलती है।

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