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हरियाणा के किसानों की बल्ले-बल्ले: अब ट्यूबवेल के पानी की जांच करेगी सरकार, जारी होंगे 'जल स्वास्थ्य कार्ड'

May 11, 2026 5:35 PM

हरियाणा। हरियाणा के किसानों के लिए खेती अब और भी वैज्ञानिक और मुनाफे वाली होने जा रही है। प्रदेश सरकार ने मिट्टी की सेहत जांचने के बाद अब ट्यूबवेलों के पानी की जांच का जिम्मा उठाया है। 'जल स्वास्थ्य कार्ड' नाम की इस महत्वाकांक्षी योजना के जरिए सरकार का लक्ष्य अगले 3 साल में खाद्यान्न उत्पादन को 2 प्रतिशत यानी करीब 5 लाख टन तक बढ़ाना है। इस मुहिम के तहत राज्य के सभी 8 लाख ट्यूबवेलों के पानी का डेटा इकट्ठा किया जाएगा। मुख्यमंत्री के विजन के अनुरूप, अब किसान केवल अंदाजा लगाकर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक रिपोर्ट के आधार पर तय करेंगे कि उन्हें कौन सी फसल बोनी है।

9 पैमानों पर होगी पानी की परख, मोबाइल पर पहुंचेगी पूरी रिपोर्ट

इस योजना की सबसे बड़ी खासियत इसका हाई-टेक होना है। ट्यूबवेल से लिए गए पानी के सैंपल को जीपीएस (GPS) लोकेशन से जोड़ा जाएगा, ताकि डेटा में किसी भी तरह की गड़बड़ी की गुंजाइश न रहे। वैज्ञानिक पानी की जांच 9 अलग-अलग पैमानों पर करेंगे, जिसमें पीएच वैल्यू, क्षारीयता, कैल्शियम, मैग्नीशियम और सल्फेट जैसे तत्वों की मात्रा जांची जाएगी। जांच के बाद 'जल स्वास्थ्य कार्ड' सीधे किसान के मोबाइल फोन पर भेज दिया जाएगा। इस कार्ड में न केवल पानी की रिपोर्ट होगी, बल्कि बोरिंग की गहराई और भू-जल स्तर की जानकारी भी दर्ज होगी।

वैज्ञानिकों की कमेटी करेगी सिफारिश, 'हैवी साल्ट' से मिलेगी मुक्ति

हरियाणा में लगभग 60 फीसदी खेती ट्यूबवेल के पानी पर टिकी है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पानी में बढ़ते 'हैवी साल्ट' ने जमीन की उर्वरा शक्ति को नुकसान पहुंचाया है। इस समस्या से निपटने के लिए कृषि विभाग ने एचएयू हिसार और करनाल के मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों की एक विशेष कमेटी बनाई है। यह टीम किसानों को बताएगी कि अगर पानी खराब है, तो जिप्सम या अन्य पोषक तत्वों के इस्तेमाल से उसे खेती लायक कैसे बनाया जाए। इससे खाद और बीज की बर्बादी रुकेगी और खेती की लागत में भी कमी आएगी।

डिजिटल मैप से बदलेगी खेती की तस्वीर: लागत घटेगी, मुनाफा बढ़ेगा

कृषि विभाग के महानिदेशक राज नारायण कौशिक के मुताबिक, इस पूरी प्रक्रिया का अंतिम लक्ष्य भू-जल का एक व्यापक डिजिटल मानचित्र (Map) तैयार करना है। इस मैप को देखकर कोई भी किसान यह जान सकेगा कि उसके इलाके का पानी किस फसल के लिए अनुकूल है। जानकारों का मानना है कि जब किसान पानी की तासीर समझकर फसल उगाएगा, तो उत्पादन तो बढ़ेगा ही, साथ ही धरती की सेहत भी बरकरार रहेगी। यह योजना उन इलाकों के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकती है जहां खारे पानी की वजह से फसलें बर्बाद हो जाती थीं।

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