हिसार में पीपीपी बनी 'परेशानी पहचान पत्र': गाड़ी हटवाने आए शख्स के नाम विभाग ने चढ़ा दी दूसरी कार
Mar 17, 2026 1:13 PM
हिसार। हिसार के जिला मुख्यालय पर लगे समाधान शिविर में जब 'अमर उजाला' की टीम पहुंची, तो वहां व्यवस्था की पोल खुल गई। सरकार जिसे जन-सुविधा कह रही है, वह लोगों के लिए जी का जंजाल बन चुकी है। सबसे चौंकाने वाला मामला नागोरी गेट के कैलाश चंद्र शर्मा का है। कैलाश अपनी 6 महीने पहले बेची गई गाड़ी को फैमिली आईडी से हटवाने के लिए पिछले तीन महीनों से दफ्तरों की खाक छान रहे हैं। तीन बार शिकायत देने के बाद जब वे शिविर पहुंचे, तो पता चला कि पुरानी गाड़ी तो हटी नहीं, बल्कि रिकॉर्ड में उनके नाम एक नई गाड़ी (नंबर- 8087) और दर्ज कर दी गई है। कैलाश ने तंज कसते हुए अधिकारियों से कहा, "जो गाड़ी आपने मेरे नाम चढ़ाई है, कम से कम वो मुझे दिला तो दो," जिसके बाद वहां मौजूद स्टाफ की बोलती बंद हो गई।
35 हजार की पुरानी कार और डेढ़ लाख की फर्जी आय
यही हाल महावीर कॉलोनी के पालेराम का है। उनके भतीजे ने गाड़ी चलाना सीखने के लिए महज 35 हजार रुपये में एक पुरानी खटारा कार खरीदी थी। लेकिन पीपीपी के जादूगरों ने इसे 'लग्जरी' मान लिया और परिवार की आय 35 हजार से बढ़ाकर सीधे 1.50 लाख रुपये कर दी। नतीजा यह हुआ कि गरीब परिवार का राशन कार्ड कट गया और घर की महिलाओं का 'लाडो लक्ष्मी योजना' का फॉर्म तक नहीं भरा जा रहा। सरकारी सहायता के नाम पर अब इस परिवार को समाज कल्याण विभाग से भी टका सा जवाब मिल रहा है। शिविर में ऐसे दर्जनों लोग थे जिनके डेटा के साथ खिलवाड़ किया गया है।
"अगले महीने आना"—अधिकारियों की बेरुखी से जनता बेहाल
समाधान शिविरों में समाधान कम और आश्वासन ज्यादा मिल रहे हैं। पीड़ितों का आरोप है कि पीपीपी वाली सीट पर बैठे कर्मचारियों को बात करने तक का सलीका नहीं है। कैलाश चंद्र ने बताया कि जब वे अपनी समस्या लेकर जाते हैं, तो कर्मचारी झिड़कते हुए कहते हैं, "हर हफ्ते मुंह उठाए आ जाते हो, एक महीना इंतजार करो।" कैलाश इस समस्या को लेकर डीसी से मिले, जिन्होंने एसडीएम के पास भेजा और एसडीएम ने फिर से उसी क्लर्क के पास, जहाँ से कहानी शुरू हुई थी। यह 'फाइल-फाइल' का खेल जनता के सब्र का इम्तिहान ले रहा है।
दिव्यांग दंपत्ति की आय ने भी चौंकाया
हैरानी की बात तो यह है कि विभाग ने एक 70 साल के दिव्यांग दंपत्ति की आय भी 1.40 लाख रुपये दिखा रखी है। बिना किसी ठोस सर्वे या फिजिकल वेरिफिकेशन के कंप्यूटर पर बैठकर लोगों के भाग्य का फैसला किया जा रहा है। राशन, पेंशन और बच्चों की छात्रवृत्ति जैसी बुनियादी जरूरतें सिर्फ कागजों की हेराफेरी की वजह से रुक गई हैं। लोग सुबह से शाम तक धूप में खड़े रहते हैं, लेकिन शाम को हाथ लगती है तो सिर्फ एक नई तारीख।