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International Yoga Day: कौन हैं 'आदि योगी' भगवान शिव, जिनसे शुरू हुई थी योग की यह पावन परंपरा?

Jun 18, 2026 5:18 PM

21 जून को जब दुनिया भर के करोड़ों लोग सूर्य नमस्कार और प्राणायाम के आसनों में लीन होंगे, तब वह अवसर सिर्फ शारीरिक तंदुरुस्ती का जश्न मनाने का नहीं होगा। असल में यह दिन भारत की उस मेधा और ऋषियों के उस तप को नमन करने का है, जिसका सिरा सीधे टाइमलाइन के पार भगवान शिव से जाकर मिलता है। आधुनिक युग में योग को भले ही एक बेहतरीन लाइफस्टाइल या फिटनेस रूटीन के तौर पर देखा जाता हो, लेकिन भारतीय मनीषी जानते हैं कि इसका मूल उद्देश्य आत्मज्ञान और चेतना का विस्तार है। और इस चेतना के शिखर पर जो आदि पुरुष विराजमान हैं, उन्हें हम शिव, आदि योगी या योगेश्वर कहते हैं।

आदि योगी: चेतना के उस पार की कहानी

'आदि' यानी शुरुआत और 'योगी' यानी वह जिसने प्रकृति और पुरुष के भेद को मिटाकर अद्वैत को पा लिया हो। पौराणिक आख्यानों और योगिक संस्कृति के अनुसार, हजारों साल पहले जब मानव सभ्यता अपने शैशव काल में थी, तब हिमालय की बर्फीली वादियों में एक अद्भुत योगी का प्राकट्य हुआ। वे न तो मुस्कुराते थे, न ही सांसारिक बंधनों में बंधते थे; वे बस अपनी समाधि में अचल बैठे रहते थे। उनके शरीर से बहने वाली ऊर्जा और आनंद को देखकर लोग उनकी तरफ आकर्षित तो हुए, लेकिन उनकी अगाध खामोशी और कठोर तप को देखकर ज्यादातर लोग वापस लौट गए।

हिमालय की कंदराओं में लगा पहला योग शिविर, ऐसे हुआ ज्ञान का प्रसार

महादेव की उस गहन समाधि के साक्षी बनने के लिए अंततः केवल सात खोजी ही बचे रहे। उन्होंने अपनी पात्रता सिद्ध करने के लिए वर्षों तक इंतजार किया और शिव की आराधना की। उनकी अटूट निष्ठा को देखकर आदि योगी का मौन टूटा और एक दक्षिणायन के दिन वे 'आदि गुरु' की भूमिका में आ गए। उन्होंने इन सात साधकों को मानव शरीर की ज्यामिति, प्राण वायु के रहस्य और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के प्रवाह को नियंत्रित करने की विधा सिखाई। यही सात साधक आगे चलकर 'सप्तऋषि' के नाम से विख्यात हुए। दीक्षा पूर्ण होने के बाद, शिव के आदेश पर इन ऋषियों ने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जाकर इस दिव्य विज्ञान का प्रचार-प्रसार किया।

ध्यान मुद्रा में शिव: स्थिर मन और संतुलन का संदेश

यदि हम शिव के स्वरूप को ध्यान से देखें, तो उनकी अधिकांश मूर्तियां और चित्र उन्हें पद्मासन या ध्यान की मुद्रा में दिखाते हैं। उनके मस्तक पर चंद्रमा मन की शीतलता को दर्शाता है, तो गले का हलाहल विष (जहर) विपरीत परिस्थितियों में भी खुद को संतुलित रखने का संदेश देता है। योग के मूल नियम—यम, नियम, आसन और प्रत्याहार—वास्तव में शिव के इसी वैराग्य और आंतरिक अनुशासन से उपजे हैं। वे सिखाते हैं कि जब तक भीतर का कोलाहल शांत नहीं होगा, तब तक बाहरी दुनिया में शांति खोजना व्यर्थ है।

योग दिवस 2026: सिर्फ रस्म अदायगी नहीं, परंपरा को जीने का दिन

आज के इस भागदौड़ भरे और तनावग्रस्त जीवन में योग की प्रासंगिकता कहीं अधिक बढ़ गई है। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस हमें इसी बात की याद दिलाता है कि बप्पा के पिता यानी महादेव से शुरू हुई यह सनातन धारा आज भी उतनी ही जीवंत और वैज्ञानिक है। चटाई (मैट) पर बैठकर किए जाने वाले कुछ आसन तो सिर्फ इस महाविज्ञान का प्रवेश द्वार हैं; असली योग तो वह है जो आपके भीतर के 'शिव' को जगा दे, आपको शांत, सजग और करुणामयी बना दे। इस योग दिवस पर आइए, आसन करने के साथ-साथ योग के उस आध्यात्मिक दर्शन को भी आत्मसात करने का संकल्प लें, जिसकी नींव आदि योगी ने रखी थी।

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