हरियाणा से शुरू हुआ रेल क्रांति का नया दौर, जींद-सोनीपत ट्रैक पर उतरी देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन
Mar 16, 2026 11:01 AM
हरियाणा। हरियाणा के जींद और सोनीपत के बीच आज वह ऐतिहासिक घड़ी आ गई, जिसका पूरे देश को बेसब्री से इंतजार था। सोमवार सुबह जैसे ही हाइड्रोजन ट्रेन ने जींद स्टेशन से अपनी पहली रवानगी भरी, भारतीय रेल एक नए युग में प्रवेश कर गई। यह सिर्फ दो शहरों के बीच का सफर नहीं है, बल्कि दुनिया को भारत की उस तकनीकी ताकत का परिचय है जो प्रदूषण मुक्त भविष्य का सपना देखती है। रेलवे बोर्ड के आदेश पर इस पूरे सप्ताह ट्रेन के दो से तीन चक्कर लगाए जाएंगे, ताकि उद्घाटन से पहले हर तकनीकी बारीकी को परखा जा सके। शनिवार को ही इस ट्रेन को दिल्ली की शकूरबस्ती वर्कशॉप से विशेष जांच के बाद वापस जींद लाया गया था।
न शोर, न धुआं: खामोशी से सफर तय करेगी यह ट्रेन
इस ट्रेन की सबसे बड़ी खासियत इसकी आवाज़ और उत्सर्जन का न होना है। पारंपरिक डीजल इंजन जहां भारी शोर और धुआं छोड़ते हैं, वहीं यह हाइड्रोजन ट्रेन केवल पानी की भाप छोड़ती है। तकनीकी नजरिए से देखें तो यह बिजली से चलने वाली ट्रेनों की तुलना में लंबी दूरी के लिए कहीं अधिक कारगर साबित हो सकती है। महज 360 किलोग्राम हाइड्रोजन के दम पर यह 180 किलोमीटर का फासला तय करने का दमखम रखती है। लखनऊ से आई आरडीएसओ (RDSO) की टीम ने पहले ही 70 किमी प्रति घंटे की रफ्तार पर इसका सफल परीक्षण कर लिया है, जिससे इसके व्यावसायिक परिचालन की उम्मीदें बढ़ गई हैं।
लग्जरी सुविधाओं के बीच यात्रियों को मिलेगा मेट्रो जैसा अनुभव
इस ट्रेन के भीतर कदम रखते ही आपको किसी अंतरराष्ट्रीय स्तर की मेट्रो का अहसास होगा। कोच के भीतर का तापमान नियंत्रित करने के लिए आधुनिक एसी सिस्टम लगा है और दोनों तरफ ऑटोमैटिक स्लाइडिंग दरवाजे दिए गए हैं। यात्रियों की सुविधा के लिए डिजिटल सूचना बोर्ड लगाए गए हैं, जो अगले स्टेशन और ट्रेन की मौजूदा गति की जानकारी देते रहेंगे। सुरक्षा और आराम के लिहाज से इसमें 'नॉइज एब्जॉर्बिंग' तकनीक का इस्तेमाल हुआ है, जिससे ट्रेन के अंदर बाहर का शोर सुनाई नहीं देता।
पर्यावरण की सुरक्षा में 'गेम चेंजर' साबित होगी यह पहल
ग्लोबल वार्मिंग के इस दौर में हाइड्रोजन ट्रेन का आना किसी वरदान से कम नहीं है। भारत सरकार के 'नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन' के तहत यह एक बड़ी उपलब्धि है। जींद-सोनीपत रूट को इसके लिए इसलिए चुना गया क्योंकि यहां की भौगोलिक स्थिति और ट्रैक पैरामीटर्स इस नई तकनीक के परीक्षण के लिए सबसे मुफीद पाए गए। आने वाले समय में यह तकनीक न केवल रेलवे का डीजल पर खर्च होने वाला करोड़ों रुपया बचाएगी, बल्कि उत्तर भारत की हवा को भी स्वच्छ रखने में मदद करेगी।