NIT कुरुक्षेत्र का मास्टरस्ट्रोक: सुसाइड केस के बाद अब ब्रह्माकुमारी सिखाएगी 'हैप्पीनेस' का मंत्र
May 01, 2026 12:20 PM
कुरुक्षेत्र। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (NIT) कुरुक्षेत्र, जो पिछले कुछ समय से छात्रों की आत्महत्या की घटनाओं के कारण सुर्खियों में बना हुआ है, अब एक नए सिरे से कैंपस के वातावरण को बदलने की कोशिश कर रहा है। संस्थान की 'थॉट लैब' में ब्रह्माकुमारी संस्था के सहयोग से एक विशेष सत्र का आयोजन किया गया, जिसका उद्देश्य शिक्षकों और कर्मचारियों को तनाव मुक्त और संतुलित जीवन जीने के लिए प्रेरित करना था। 'दिल खोलो, जीवन संवारो' जैसे संदेशों के साथ इस कार्यक्रम में यह समझाने की कोशिश की गई कि अगर सोच बदली जाए, तो गंभीर मानसिक अवसाद से भी निपटा जा सकता है।
भावनात्मक ब्लॉकेज बन रहे हैं बीमारियों की जड़
माउंट आबू से पहुंचे प्रसिद्ध हैप्पीनेस कोच और काउंसलर डॉ. सचिन परब ने इस दौरान बेहद मार्मिक और तकनीकी पहलुओं पर अपनी बात रखी। उन्होंने 'इमोशनल क्लॉट्स' यानी भावनात्मक अवरोधों की अवधारणा को विस्तार से समझाया। डॉ. परब का कहना था कि हमारी ज्यादातर समस्याओं की जड़ बाहरी हालात नहीं, बल्कि हमारे मन के भीतर चलने वाले विचार हैं। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यदि व्यक्ति अपने मन को दूसरों के सामने नहीं खोलेगा, तो अंततः उसे डॉक्टरों के पास जाकर ऑपरेशन थिएटर में अपना दिल खुलवाना पड़ सकता है।
आंसुओं को बहने दें, मन हल्का होगा
डॉ. परब ने मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशीलता दिखाते हुए कहा कि भावनाओं को व्यक्त करना कमजोरी नहीं, बल्कि मानसिक मजबूती की निशानी है। उन्होंने बताया कि रोने के दौरान निकलने वाले आंसू शरीर से तनाव पैदा करने वाले हार्मोन को कम करते हैं, जिससे मन को तुरंत राहत मिलती है। सत्र के दौरान शिक्षकों को यह मंत्र दिया गया कि वे अपनी दबी हुई भावनाओं को बाहर निकालें ताकि वे शारीरिक और मानसिक बीमारियों की चपेट में आने से बच सकें।
जांच के साये में एनआईटी प्रशासन
संस्थान में यह पहल ऐसे समय में हुई है जब 16 फरवरी से 16 अप्रैल के बीच चार छात्रों ने मौत को गले लगा लिया था। इन घटनाओं के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की उच्च स्तरीय टीम और महिला आयोग ने कैंपस का दौरा कर कड़े सवाल पूछे थे। फिलहाल एनआईटी प्रशासन मानवाधिकार आयोग के नोटिस के घेरे में भी है, जिसका जवाब उन्हें 19 मई तक दाखिल करना है। ऐसे में कैंपस के भीतर इस तरह के काउंसलिंग सत्रों को संस्थान की छवि सुधारने और छात्रों व शिक्षकों के बीच विश्वास बहाली के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।