AAP के 7 सांसदों के साथ BJP में विलय का ऐलान, खतरे में केजरीवाल की राज्यसभा टीम!
Apr 24, 2026 8:23 PM
देश की राजधानी दिल्ली और पंजाब की सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी में शुक्रवार को उस वक्त बड़ी टूट हो गई, जब राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने भाजपा में शामिल होने का बिगुल फूँक दिया। राघव चड्ढा ने दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि उनके साथ राज्यसभा के कुल 10 में से 7 सांसद मौजूद हैं। संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक, यह संख्या कुल सांसदों का दो-तिहाई है, जिसका सीधा मतलब है कि इन सांसदों पर दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता की तलवार नहीं लटकेगी। राघव चड्ढा के साथ इस मंच पर अशोक मित्तल और संदीप पाठक जैसे कद्दावर चेहरे भी नजर आए, जिससे सियासी हलकों में हड़कंप मच गया।
क्यों बदला चड्ढा का मन: अपमान और 'सॉफ्ट PR' के आरोपों की कहानी
राघव चड्ढा और अरविंद केजरीवाल के बीच की दरार पिछले कुछ महीनों से लगातार बढ़ रही थी। पार्टी ने कुछ समय पहले ही राघव को राज्यसभा में उप नेता के पद से हटा दिया था। उन पर आरोप लगा था कि वे सदन में सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख नहीं अपना रहे और केवल 'सॉफ्ट PR' में जुटे हैं। उनकी जगह जिन्हें नया उप नेता बनाया गया था, वे अशोक मित्तल भी आज चड्ढा के ही बगल में बैठे नजर आए। अशोक मित्तल के ठिकानों पर महज 10 दिन पहले ईडी की छापेमारी हुई थी। राघव ने भावुक होते हुए कहा कि जिस पार्टी को उन्होंने 15 साल दिए, वह अब राष्ट्रहित के बजाय निजी फायदे और भ्रष्टाचार के दलदल में फंस चुकी है।
अशोक मित्तल, हरभजन सिंह और स्वाति मालिवाल भी बागी गुट में?
राघव चड्ढा ने दावा किया है कि उनके साथ पंजाब से राज्यसभा सांसद हरभजन सिंह, विक्रमजीत सिंह साहनी, राजेंद्र गुप्ता और दिल्ली से स्वाति मालिवाल भी इस फैसले में शामिल हैं। यह टूट आम आदमी पार्टी के लिए अस्तित्व का संकट खड़ी कर सकती है, क्योंकि राज्यसभा में पार्टी की ताकत अब न के बराबर रह जाएगी। चड्ढा ने तंज कसते हुए कहा कि वे सही इंसान थे लेकिन गलत पार्टी में फंस गए थे। उन्होंने साफ किया कि राजनीति में आने से पहले वे एक चार्टर्ड अकाउंटेंट थे और अब राष्ट्र सेवा के लिए नया रास्ता चुन रहे हैं।
संविधान की 10वीं अनुसूची: क्या बच जाएगी सांसदों की कुर्सी?
भारतीय राजनीति में "आया राम गया राम" का दौर खत्म करने के लिए 1985 में 10वीं अनुसूची लाई गई थी। हरियाणा के विधायक गया लाल के बार-बार पार्टी बदलने के बाद यह कानून बना था। वर्तमान नियम के अनुसार, यदि किसी पार्टी के दो-तिहाई (2/3) सांसद या विधायक एक साथ अलग होकर किसी दूसरी पार्टी में विलय करते हैं, तो उनकी सदस्यता रद्द नहीं होती। 'आप' के 10 राज्यसभा सांसदों के गणित में 7 का आंकड़ा जादुई है। यदि चड्ढा के पास 7 सांसद हैं, तो भाजपा में उनका विलय कानूनी रूप से वैध होगा और सदन में भाजपा की ताकत बढ़ जाएगी।
केजरीवाल से बढ़ती दूरियों की असली वजह
जानकारों की मानें तो केजरीवाल के जेल जाने के वक्त राघव चड्ढा का लंदन में होना इस दूरी की शुरुआत थी। हालांकि उन्होंने आंखों के इलाज का हवाला दिया था, लेकिन पार्टी के भीतर उन्हें लेकर शक के बीज तभी बो दिए गए थे। लोकसभा चुनाव में भी उन्हें पंजाब की राजनीति से दूर रखा गया। आज की बगावत ने साफ कर दिया है कि अरविंद केजरीवाल और राघव चड्ढा के बीच का तालमेल अब पूरी तरह खत्म हो चुका है, जिसका खामियाजा अब पार्टी को उच्च सदन में भुगतना पड़ रहा है।