1921 में बना था भारत का पहला बोर्ड, जानें कैसे बदली आपकी मार्कशीट की वैल्यू
Mar 21, 2026 12:07 PM
भारत में आज जिस बोर्ड परीक्षा प्रणाली को हम देखते हैं, उसकी जड़ें ब्रिटिश औपनिवेशिक काल से जुड़ी हैं। अंग्रेजों ने भारतीय शिक्षा को एक मानक सांचे में ढालने और सरकारी नौकरियों के लिए योग्य उम्मीदवारों को चुनने के उद्देश्य से सेंट्रलाइज्ड टेस्ट यानी बोर्ड परीक्षाओं की शुरुआत की थी। इससे पहले भारत में शिक्षा की कोई एक तय या केंद्रीकृत परीक्षा प्रणाली मौजूद नहीं थी।
1858 में हुई थी पहली मैट्रिक की परीक्षा
इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि साल 1857 में कलकत्ता, बॉम्बे और मद्रास यूनिवर्सिटी की स्थापना हुई थी। इसके ठीक एक साल बाद यानी 1858 में कलकत्ता यूनिवर्सिटी ने पहली बार मैट्रिक (कक्षा 10वीं) की बोर्ड परीक्षा आयोजित की। उस समय शिक्षा केवल उच्च वर्ग और संपन्न लोगों तक सीमित थी। सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि परीक्षा का माध्यम केवल अंग्रेजी था, जबकि उस दौर में अधिकांश भारतीयों को इस भाषा का ज्ञान नहीं था।
यूपी बोर्ड: देश का पहला आधिकारिक शिक्षा बोर्ड
भारत में शिक्षा को व्यवस्थित और एक समान बनाने के लिए 1921 में 'उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड' का गठन किया गया। यह भारत का सबसे पहला आधिकारिक एजुकेशन बोर्ड है। इसके बाद साल 1930 में हाई स्कूल और इंटरमीडिएट स्तर पर विज्ञान और कला विषयों की परीक्षाएं विधिवत तरीके से शुरू हुईं। यह वही दौर था जब बोर्ड परीक्षाओं ने वह स्वरूप लेना शुरू किया जो आज हमें देखने को मिलता है।
आम छात्र के लिए क्यों कठिन थी परीक्षा?
शुरुआती बोर्ड परीक्षाओं का ढांचा भारतीय छात्रों के अनुकूल नहीं था। अंग्रेजी भाषा की अनिवार्यता और संसाधनों की कमी के कारण यह परीक्षाएं एक बड़े वर्ग के लिए पहुंच से बाहर थीं। आज उत्तर प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली-NCR समेत पूरे उत्तर भारत में बोर्ड परीक्षाएं एक उत्सव और चुनौती की तरह देखी जाती हैं, लेकिन इसका सफर एक कठिन अंग्रेजी टेस्ट से शुरू होकर आज की आधुनिक और बहुभाषी प्रणाली तक पहुंचा है।