घग्गर नदी बनी 'कैंसर का दरिया': सिरसा के मल्लेवाला गांव में हर घर में बीमारी का खौफ
Apr 13, 2026 10:25 AM
सिरसा। हरियाणा के सिरसा जिले का मल्लेवाला गांव कभी घग्गर नदी के साफ पानी और उसके किनारे मछली पकड़ने वाले बच्चों की किलकारियों के लिए जाना जाता था। लेकिन आज इसी गांव की हवाओं में डर और पानी में जहर घुला हुआ है। दिल्ली से करीब 250 किलोमीटर दूर बसे इस गांव की धड़कन कही जाने वाली घग्गर अब इतनी प्रदूषित हो चुकी है कि इसके पास खड़े होना भी दूभर है। ग्रामीणों का आरोप है कि नदी का यह काला पानी उनके घरों में कैंसर बांट रहा है। गांव के निवासी सुरेश कुमार की आंखों में वो दौर आज भी तैरता है जब नदी का पानी कांच जैसा साफ होता था, लेकिन अब उनकी भाभी और भाई जैसे कई अपनों को इसी बीमारी ने लील लिया है।
जमीन बिकी, घर उजड़े पर नहीं थमा बीमारी का सिलसिला
मल्लेवाला गांव की 4,000 की आबादी आज एक अनकहे खौफ के साये में जी रही है। स्थानीय लोगों के अनुसार, साल 2007 के बाद से कैंसर के मामलों में जो तेजी आई, उसने कई परिवारों को आर्थिक और मानसिक रूप से तोड़ दिया है। 38 साल के गुरलाल सिंह की कहानी रोंगटे खड़े कर देने वाली है; उन्होंने महज कुछ सालों के भीतर अपने पिता और दो चाचाओं को कैंसर से खो दिया। गुरलाल बताते हैं कि पिता के इलाज के लिए उन्हें अपनी 8 एकड़ खेती की जमीन तक बेचनी पड़ी। सिरसा में कैंसर के इलाज की पुख्ता सुविधाएं न होने के कारण मरीजों को पंजाब के भटिंडा या राजस्थान के बीकानेर और जयपुर जैसे दूरदराज के शहरों की खाक छाननी पड़ती है।
आंकड़ों की बाजीगरी या हकीकत से मुंह मोड़ता विभाग?
हैरानी की बात यह है कि स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े और जमीनी हकीकत मेल नहीं खाते। 'कैंसर एटलस इन हरियाणा स्टेट' की रिपोर्ट के अनुसार, सिरसा में 2016-17 के बीच सालाना औसतन 754 मरीज सामने आए थे, जबकि स्वास्थ्य विभाग के ताजा आंकड़े इस संख्या को महज 110 से 136 के बीच समेट देते हैं। इस विरोधाभास के पीछे की मुख्य वजह प्राइवेट अस्पतालों और डायग्नोस्टिक लैब द्वारा मरीजों का डेटा साझा न करना माना जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग के महानिदेशक मनीष बंसल का कहना है कि डेटा में यह 'गैप' इसलिए भी है क्योंकि लोग इलाज के लिए दूसरे राज्यों में चले जाते हैं।
प्रशासनिक उदासीनता और सरकारी कोशिशें
जहां एक तरफ डिप्टी सिविल सर्जन विपुल गुप्ता कैंसर में किसी भी 'तेजी से बढ़ोतरी' को खारिज करते हुए इसे रूटीन बता रहे हैं, वहीं सिरसा नागरिक अस्पताल में दो महीने पहले ही कीमोथेरेपी के लिए छह बेड का डे-केयर सेंटर खोला गया है। हालांकि, ग्रामीणों का मानना है कि ये कोशिशें ऊंट के मुंह में जीरे के समान हैं। जब तक घग्गर में गिरते औद्योगिक कचरे और गंदे नालों को नहीं रोका जाता, तब तक इस इलाके के लोगों के सिर पर मंडराता मौत का यह खतरा टलने वाला नहीं है।